डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद और नेहरू के बीच क्यों थीं इतनी दूरियां?मंजू लता शुक्ला की एक विशेष रिपोर्ट

आजादी की लड़ाई में वे एकजुट थे लेकिन आजाद भारत की अगुवाई में उनकी असहमतियां सतह पर थीं. देश के प्रथम राष्ट्रपति के तौर पर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के दोनों कार्यकाल उनके और प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच कई सवालों पर मतभेद और ठंडे रिश्तों के लिए याद किये जाते हैं. राष्ट्रपति के प्रथम कार्यकाल के लिए पंडित नेहरू की पहली पसंद सीआर राजगोपालाचारी थे. दूसरे कार्यकाल में वे यह जिम्मेदारी तत्कालीन उपराष्ट्रपति एस राधाकृष्णन को देना चाहते थे. पर दोनों बार पलड़ा डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के पक्ष में झुका.

मंजूलता शुक्ला(नव्या)

राष्ट्रपति के स्वविवेक से चुनाव कराने की कानून में कोई लिखित व्यवस्था नहीं है लेकिन यदि राष्ट्रपति दृढ़ता से यह अनुभव करते हैं कि लोकसभा देश के राजनीतिक संतुलन को प्रतिबिंबित नहीं करती तो सुरक्षित अधिकार के तौर पर वे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

सर्वोच्च सेनापति के रूप में वे सेना प्रमुखों को सीधे नहीं अपितु रक्षामंत्री के जरिए जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच पहला टकराव 1950 में हुआ जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पश्चात इसके कार्यक्रम में भागीदारी से मनाही की पंडित नेहरू की सलाह को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अनसुना कर दिया.

आजादी के संघर्ष में अग्रणी भूमिका के साथ ही संविधान सभा के अध्यक्ष के तौर पर अपनी विलक्षण प्रतिभा और निर्विवाद छवि के कारण डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद का कद बहुत ऊंचा था. स्वयं पंडित नेहरू भी निजी तौर पर उनका काफी सम्मान करते थे लेकिन कार्यशैली और वैचारिक भिन्नता के चलते प्रथम राष्ट्रपति और प्रथम प्रधानमंत्री के मध्य सब कुछ बहुत सहज और सामान्य नहीं रह सका.

राष्ट्रपति के अधिकारों से जुड़े सवाल

राष्ट्पति चुने जाने के कुछ दिनों बाद ही डॉक्टर प्रसाद ने राष्ट्रपति के अधिकारों के सिलसिले में संवैधानिक महत्व के तीन सवाल उठाये . उनके अनुसार राष्ट्रपति स्वविवेक से किसी विधेयक की मंजूरी रोकने में सक्षम है. किसी मंत्री अथवा मंत्रिमण्डल को बर्खास्त करने और आम चुनाव कराने के लिए अधिकृत है और सेना के सर्वोच्च सेनापति के नाते प्रतिरक्षा से संबंधित विषयों में सेना प्रमुखों को सीधे संदेश दे सकते हैं अथवा जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. पंडित नेहरू ने इन प्रश्नों पर अटॉर्नी जनरल एमसी सीतलवाड़ का अभिमत मांगा.

सीतलवाड़ ने उत्तर दिया कि राष्ट्रपति किसी विधेयक की मंजूरी रोक नहीं सकते लेकिन संवैधानिक मुखिया के नाते अन्य माध्यमों से वह अपना प्रभाव व्यक्त कर सकते हैं. किसी मंत्री को सीधे बर्खास्त नहीं कर सकते लेकिन मन्त्रिमण्डल की छुट्टी करके चुनाव कराने का आदेश दे सकतें हैं.

सोमनाथ मंदिर के कार्यक्रम को लेकर टकराव

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच पहला टकराव 1950 में हुआ जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पश्चात इसके कार्यक्रम में भागीदारी से मनाही की पंडित नेहरू की सलाह को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अनसुना कर दिया. पंडित नेहरू कार्यक्रम को धार्मिक पुनरुत्थान से जुड़ा मानते हुए धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के संवैधानिक मुखिया की इसमें उपस्थिति को अनुचित मानते थे. प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर को एक विदेशी आक्रांता के प्रतिरोध का प्रतीक बताते हुए कहा था कि मैं अपने धर्म में विश्वास करता हूं और उससे मैं स्वयं को अलग नहीं कर सकता. नाराज नेहरू ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय को इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति के भाषण की सरकारी विज्ञप्ति जारी करने से रोक दिया.

हिंदू कोड बिल पर भी मतभेद

दूसरा बड़ा मतभेद हिन्दू कोड बिल पर राष्ट्रपति की मंजूरी को लेकर हुआ. बिल के व्यापक विरोध को देखते हुए राष्ट्रपति का सुझाव था कि इस पर पहले जनता की राय ली जाए. उनका कहना था कि आधे से अधिक सांसदों से बिल पर उनकी विस्तार से चर्चा हुई है और उन्होंने उनके मत का समर्थन किया है. डॉक्टर अंबेडकर जिन्होंने इस बिल को तैयार किया था, ने राष्ट्रपति को ‘ प्रतिक्रियावादी ‘ करार दिया. पंडित नेहरू की भी यही सोच थी. लेकिन डॉक्टर प्रसाद अडिग रहे. आमचुनाव में कांग्रेस को मिले व्यापक जनसमर्थन के बाद डॉक्टर प्रसाद ने बिल को अपनी सहमति दे दी.

पटेल के अंतिम संस्कार में राष्ट्रपति की भागीदारी पर था एतराज

राष्ट्रपति के रूप में डॉक्टर प्रसाद द्वारा सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में बम्बई जाने पर भी पंडित नेहरु ने आपत्ति की थी. राष्ट्रपति की 1952 की बनारस यात्रा भी एक बड़े विवाद का कारण बनी. इस यात्रा में उन्होंने काशी के कुछ विद्वान पंडितों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के प्रतीक स्वरूप उनके चरण धोये थे. नेहरू की खुली नाराजगी के जबाब में राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि देश के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति भी किसी विद्वान के समक्ष कमतर माना जाएगा.

दूसरे कार्यकाल के क्यों थे नेहरू खिलाफ ?

मशहूर पत्रकार दुर्गादास ने अपनी बहुचर्चित किताब ” इंडिया फ्रॉम कर्ज़न टू नेहरू एंड आफ़्टर में राष्ट्रपति के पद पर रहते डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से दूरियों का विस्तार से ब्यौरा दिया है. उनके अनुसार प्रसाद के दूसरे कार्यकाल को रोकने के लिए पंडितजी ने दक्षिण भारत के चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में यह विचार व्यक्त किया था कि प्रधानमंत्री चूंकि उत्तर से हैं, इसलिए वे चाहेंगे कि राष्ट्रपति दक्षिण से हो. लेकिन इन मुख्यमंत्रियों ने क्षेत्रीयता के आधार पर चयन में कोई रुचि नहीं दिखाई और राजेंद्र प्रसाद के पुनर्निर्वाचन का पक्ष लिया.

पंडित नेहरू इस पद पर उन्हें क्यों क्यों नहीं चाहते थे? दुर्गादास ने पंडित नेहरू के भरोसेमंद तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से इसका जबाब पाने की कोशिश की थी. पंत ने उन्हें बताया था कि कुछ दरबारी नेहरू के दिमाग में जहर भरने में लगे थे कि संघ-जनसंघ की मदद से राजेन्द्र प्रसाद तख्ता पलट कर सकते हैं. पन्त के अनुसार पंडित जी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद ऐसी विशिष्ट शख्सियतों के लिए उपयुक्त मानते थे,जिन पर राजनीति का रंग न चढ़ा हो.

नेहरू को प्रसाद में नहीं दिखती थी धर्मनिरपेक्ष छवि

दुर्गादास ने लिखा है कि पंडित नेहरू की नज़र में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद आधुनिक भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे , इसलिए उनकी विदेश यात्राओं के प्रस्ताव वे लटकाते थे. पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति की इकलौती विदेश यात्रा हिन्दू राष्ट्र नेपाल की थी. 1958 में नेहरू अनिच्छापूर्वक राष्ट्रपति की जापान और बाद में दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की उनकी यात्राओं के लिए राजी हुए थे. उनकी जापान, वियतनाम और श्रीलंका की यात्राएं बेहद सफल हुई थीं. 1959 में अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर और 1961 में क्वीन एलिजाबेथ की भारत यात्राओं के बाद राष्ट्रपति को मिले जबाबी निमंत्रण फाइलों में दबे रह गए.

दुर्गादास के अनुसार, प्रसाद ने उन्हें बताया था कि नेहरू उनसे वैदेशिक मामलों पर चर्चा नहीं करते थे और विदेशी मेहमानों से उनकी मुलाकातों में गम्भीर विषयों पर चर्चा के लिए हतोत्साहित करते थे. दुर्गादास ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषयों सहित अनेक सवालों पर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा पंडित नेहरू को समय-समय पर लिखे पत्रों और नोट्स का जिक्र करते हुए लिखा है कि वे प्रायः इन्हें उन्हें दिखाते थे. दुर्गादास ने राजेन्द्र प्रसाद से आग्रह किया था कि पंडित नेहरू से अपनी मुलाकातों के दौरान वे इन विषयों पर विचार-विमर्श करें.

दास के अनुसार वे इसे निरर्थक मानते थे , क्योंकि अंततः दोनों के बीच असहमति और उत्तेजक बहस पर बात खत्म होने का अंदेशा रहता था. दुर्गादास का राजेन्द्र प्रसाद के विषय में आकलन था कि वे पंडित नेहरू की मौजूदगी में स्वतंत्रतापूर्वक अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे, इसलिए उनसे संवाद से बचते थे. देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के मसले पर राजेन्द्र प्रसाद ने बेहद कड़ी भाषा मे प्रधानमंत्री को एक टिप्पणी में लिखा था कि यह कांग्रेस के ताबूत में कील साबित होगा. उन्होंने राष्ट्रपति अथवा किसी स्वतंत्र इकाई के अधीन ओम्बुड्समैन की व्यवस्था का सुझाव दिया था.

पंडित नेहरू ने इसका लिखित उत्तर नहीं दिया था लेकिन राष्ट्रपति से भेंट के दौरान इसे अमैत्रीपूर्ण सुझाव बताया था. प्रसाद को उनकी मंशा की गलत व्याख्या किये जाने से काफी पीड़ा हुई थी. राज्यपाल, राजदूतों और अन्य संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों की जानकारी पहले प्रेस के जरिये होने और फिर इसकी आधिकारिक सूचना स्वयं के पास पहुंचने की भी राष्ट्रपति की शिकायत थी. इस शिकायत के बाद कैबिनेट ने फैसला किया कि ऐसी नियुक्तियों के पूर्व फाइलें पहले राष्ट्रपति के पास भेजी जाएं.

सर्वोच्च सेनापति होने के बाद भी थल सेनाध्यक्ष जनरल थिमैय्या के इस्तीफे से अनभिज्ञ रखे जाने के मामले में प्रसाद की नाराजगी के बाद प्रतिरक्षा मंत्री वी.के.कृष्णा मेनन को क्षमा मांगनी पड़ी थी. बाद में उन्होंने पंडित नेहरू के सामने अपना क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था कि आप गलत परम्पराएं स्थापित कर रहे हैं. ऐसा राष्ट्रपति जो आपके अनुकूल नहीं होगा ,वह आपके लिए बड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है. अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में एक विधि संस्थान में अपने संबोधन में उन्होंने विधि विशेषज्ञों से संविधान के अधीन राष्ट्रपति के अधिकारों के अध्ययन का सुझाव दिया था.

वह भारत के राष्ट्रपति को ब्रिटिश साम्राज्ञी के समतुल्य माने जाने से असहमत थे और इस सम्बन्ध में समुचित परम्पराओं की स्थापना की जरूरत अनुभव करते थे. इस सम्बोधन के बाद पंडित नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद से अपनी भेंट में कहा था कि के.एम.मुंशी ने आपको भ्रमित किया है और आपकी टिप्पणी राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देने वाली नहीं थीं.

राजेन्द्र प्रसाद ने इसके पीछे मुंशी की भूमिका से इनकार किया था और कहा था कि उनके विचार में देश के नया गणतंत्र होने के कारण इस विषय पर अध्ययन आवश्यक है और इसके लिए विधि संस्थान से अधिक उपयुक्त अन्य कोई स्थान नहीं हो सकता. राष्ट्रपति के इस भाषण की सरकारी विज्ञप्ति जारी नहीं हुई थी. केंद्र-राज्य सम्बन्धों और चीन के प्रति सरकार की नीति सहित कई सवालों पर राष्ट्रपति सरकार से असहमत थे.

दिल्ली में अंतिम संस्कार स्थल की हुई थी खोज

दुर्गादास के अनुसार कार्यकाल की समाप्ति के दस माह पूर्व राजेन्द्र प्रसाद काफी गम्भीर रूप से बीमार हुए. उनकी बेहद नाजुक दशा देखते हुए अंतिम संस्कार के स्थल की खोज शुरू हुई. बहुत ही संवेदनशील विषय होने के कारण इसे गोपनीय रखा जाना जरूरी था. गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ कार में दिल्ली के कमिश्नर भगवान सहाय आईसीएस थे.

ड्राइविंग की जिम्मेदारी डिप्टी कमिश्नर सुशीतल बनर्जी पर थी. इस टीम ने राजघाट से काफी दूर एक स्थल का चयन किया. सौभाग्य से राजेन्द्र प्रसाद स्वस्थ हो गए. दुर्गादास ने लिखा है कि बाद में 1966 में इसी स्थल पर लाल बहादुर शास्त्री का अंतिम संस्कार हुआ, जिसे अब विजय घाट के नाम से जाना जाता है.

अंतिम संस्कार में नेहरू नहीं हुए शामिल

13 मई 1962 को राजेन्द्र प्रसाद जी का राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा हुआ. उनका थोड़ा सा जीवन शेष था, जो पटना में सदाकत आश्रम की कुटिया में बेहद सादगी से गुजरा. 28 फरवरी 1963 को पटना में उनका निधन हुआ. पंडित नेहरू का उस दिन प्रधानमंत्री सहायता कोष के लिए धन एकत्रित करने का एक कार्यक्रम राजस्थान में पूर्वनिर्धारित था. इस कारण राष्ट्रपति राधाकृष्णन से उन्होंने पटना में पूर्व राष्ट्रपति के अंतिम संस्कार में शामिल

विशेष- दुर्गादास अपनी किताब में लिखते हैं कि नेहरू ने राधाकृष्णन से कहा कि उनका भी वहां जाना जरूरी नहीं है. राधाकृष्णनन ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि नहीं मेरा वहां जाना जरूरी है. जिस सम्मान के पूर्व राष्ट्रपति हकदार हैं, वह उन्हें जरूर दिया जाना चाहिए. राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को भी राजस्थान का दौरा रद्द करके पटना चलने का सुझाव दिया. दोनों ने एक-दूसरे के सुझाव अस्वीकार किये. उस दिन पंडित नेहरू राजस्थान और राधाकृष्णनन पटना गए थे.होने में असमर्थता जताई.

(लेखिका समाजिक कार्यकर्ता ,धार्मिक एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलो की जानकार है )