Thursday, January 27, 2022
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किसे हिन्दू कहें और किसे अहिन्दू?

लखनऊ/अरुण कुमार सिंह-किसे हिन्दू कहें और किसे अहिन्दू? जो लोग श्रुतिस्मृति व पुराणों को प्रमाण मानते हैं वे‘सनातनी’ कहलाते हैं। जो केवल श्रुति को ही प्रमाण मानते हैं वे ‘वैदिक’ कहलाते हैं। स्वयं के र्ध्म को वैदिक धर्म की शाखा इतना ही नहीं तो विकसित रुप भी मानने से जो नकारा करते हैं और इस प्रकार स्वधर्म को पूर्णतः स्वतंत्रा धर्म मानते हैं-ऐसे जैन, सिक्ख, बौ(, भारतीय बौ( आदि कोई भी अपनी र्ध्मनिष्ठा का यत्किंचित् त्याग किये बिना ही प्रस्तुत हिन्दुत्व की परिभाषानुसार स्वतः को सुखेनैव हिन्दू मान सकता है, इतना ही नहीं तो उससे नकारा कर ही नहीं सकता।

वैसे ही मुसलमान, ईसाई, जैनआदि जो अहिन्दू हैं, उन्हें अहिन्दू क्यों कहा जाये इसे निःसंदिग्धता से बताया जा सकता है। देखिये-
जैन हिन्दू कैसे?

प्राचीन वैदिक काल से ही जैनियों के पितरों की परम्परागत पितृभू भारतभूमि ही है तथा उनके तीर्थंकरादि धर्म-गुरुओं ने उनके जैन र्ध्म की स्थापना इसी भारत भूमि में की होने से यह भारत भूमि उनकी पुण्यभू ;भ्वसल स्ंदकद्ध भी है ही। इस ‘अर्थ में तथा केवल इसी अर्थ में’ हमारे बहुसंख्यक जैन बन्ध्ु स्वेच्छा से स्वतः को हिन्दू मानेंगे।
क्योंकि, यह ऐतिहासिक सत्य है एवं उनमें से जिन लोगों का ऐसा विश्वास है कि, उनका र्ध्म वैदिक र्ध्म की शाखा न होकर पूर्णतः स्वतंत्रा या अवैदिक र्ध्म है, उनकी इस धरणा को भी प्रस्तुत परिभाषा से तनिक भी ठेस नहीं पहुँचती।

जिस काल में हिन्दू अर्थात् वैदिक, ऐसा हिन्दू शब्द का भ्रान्तिपूर्ण अर्थ माना जाता था तब भी ऐसे स्वतंत्रा धर्ममतवादी जैनियों को उस विशिष्ट अर्थ में स्वयं को हिन्दू
कहलाने में विषमता का अनुभव होना स्वाभाविक ही था।
सिक्ख हिन्दू कैसे?

चूँकि उसी वैदिक सप्तसिन्ध्ु की सिन्ध्ुसरिता से सरस्वती तक के आर्यों के मूलस्थान में उनका आज भी परम्परागत निवास है, अतएव भारतभूमि ही उनकी पितृभू है तथा चूँकि, उनके नानकादि र्ध्मगुरुओं ने इसी भूमि में उनके सिक्ख र्ध्म की प्रस्थापना की-उनके र्ध्म की जड़ भी इसी भूमि में पफैली हुई है, अतः इसी अर्थ में यह भारतभूमि उनकी पुण्यभूमि है, भ्वसल स्ंदक है। अतः सिक्ख हिन्दू ही हैं, फिर चाहे वे वेद को मानते हों, या न मानते हों, मूर्ति पूजा करते हों, या न करते हों।
आर्यसमाजी हिन्दू कैसे?


जहाँ तक पितृभूमि के प्रति गर्व का, प्रेम का प्रश्न है, आर्यसमाजी तो किसी से पीछे रहने वाले नहीं तथा वैसे ही इस भारत भूमि को पुण्यभूमि का सम्मान देने में भी वे सदा ही आगे रहते हैं। वे तो हिन्दू हैं ही, फिर चाहे वे पुराण एवं स्मृतियों को माने या न मानें।

यही बात ‘लिंगायत राधस्वामीपंथी’ आदि हमारे यच्चयावत् एवं र्ध्मपंथों की है अपरंच, ‘भील, सन्थाल, कोलेरियन’ आदि जो लोग भूत-प्रेतों की या पदार्थ की पूजा
करने वाले ।दपउपेजेद्ध होंगे उनकी भी परम्परागत पितृभूमि भारतभूमि ही है तथा कम से कम ज्ञात इतिहासकाल से तो उनके पूजापंथ इसी भारत-भूमि को पुण्यभू भी मानते आये
हैं। अतएव वे भी हिन्दू ही हैं। इस प्रकार समस्त हिन्दू बन्धु परिभाषा में सहज ही समा जाते हैं।
पर मुसलमान-ईसाई-ज्यू हिन्दू क्यों नहीं माने जा सकते?
यद्यपि उनमें से ऐसे कई लोगों की परम्परागत पितृभूमियह भारतभूमि ही है, जो र्ध्मपरिवर्तन से भ्रष्ट हो चुके हैं, फिर भी उनके र्ध्म अरबस्थान पैलेस्टाइन आदि भारत बाह्य देशों में उत्पन्न होने से, वे उन भारत-बाह्य देशों को ही स्वतः की पुण्यभू भ्वसल स्ंदक मानेंगे। इस प्रकार यह भारतभूमि उनकी दृष्टि में पुण्यभू न होने से वे हिन्दू नहीं माने जासकते।
वैसे ही चीनी-जापानी-स्यामी आदि को भी पूर्णतः हिन्दू क्यों नहीं माना जा सकता?

जो भी, उपर्युक्त लोग र्ध्म से हिन्दू ;बौ(द्ध हैं और इस प्रकार भारतभूमि उनकी पुण्यभू है तो भी वही भारतभूमि उनकी पितृभू नहीं है। उनका हमारा सम्बन्ध् र्ध्म का है।पर, राष्ट्रभाषा, वंश, इतिहास आदि सर्वथा भिन्न हैं। उनकाहमारा एक राष्ट्रीय सम्बन्ध् तो मूलतः नहीं ही है, इसीलिए यद्यपि वे हिन्दू र्ध्म के अन्तर्गत हैं तो भी सम्पूर्ण हिन्दुत्व के अध्किारी नहीं हो सकते। स्थिति भी वैसी ही है।

जापानी, चीनी आदि बौ( होने के नाते स्वयं को हिन्दू धर्म के अनुयायी कहला सकते हैं, पर वे हिन्दू राष्ट्र के अन्तर्गत नहीं रहेंगे, संलग्न तो निश्चित रुप से ही नहीं कहलायेंगे।
‘हिन्दू र्ध्म परिषद में’ उन्हें समानता से समाविष्ट किया जा सकता है-पर ‘हिन्दू महासभा में’ अर्थात् हमारी ‘हिन्दू राष्ट्रसभा में’ उन्हें समाविष्ट नहीं किया जा सकता। उनकी राष्ट्रसभाओं में हमें समाविष्ट नहीं किया जा सकता। पर वैदिक, सिक्ख, भारतीय बौ(, जैन, सनातनी आदि हम सब लोग जो हिन्दुत्व के पूर्णतः अध्किारी हैं, एक राष्ट्रीय भी हैं ही, क्योंकि भारतभूमि केवल हमारी पुण्यभू ही न होकर पितृभू भी है।
शु(िकृतों की समस्या भी इस परिभाषा से उसी प्रकार हल की जा सकती है। जो पूर्व में हिन्दू ही थे वे शु( होते ही पूर्ण रुप से हिन्दुत्व के अध्किारी हो जाते हैं, क्योंकि उनकी पितृभू एवं पुण्यभू दोनों ही भारतभूमि ही है। पर, जो अमेरिकन, आंग्ल ;अंग्रेजद्ध आदि विदेशी हैं, जिनकी पितृभू भारतभूमि नहीं है।
उनके द्वारा ‘हिन्दू र्ध्म का ग्रहण होते ही वे र्ध्म से हिन्दू हो जाते हैं, पर राष्ट्रीय दृष्टि से भिन्न होने से सम्पूर्ण हिन्दुत्व के अध्किारी नहीं माने जा सकते।’ क्योंकि, यद्यपि भरतभूमि उनकी पुण्यभू होगी, तो भी, पितृभू तो कोई दूसरी भूमि ही होगी।
‘उनमें से जो लोग शरीर सम्बन्ध् से हमसे विवाहब(होंगे-अर्थात् वंश, जाति, राष्ट्र आदि रुपों में-रक्तबीज से हमसेएकरुप होंगे या हिन्दुस्थान की नागरिकता प्राप्त कर उसे
पितृभू मानेंगे तो वे पूर्णतः हिन्दुत्व के अध्किारी होंगे।

हिन्दू’की हमारी यह परिभाषा ‘समस्त संसार में’ हिन्दू र्ध्म का प्रचार करने के मार्ग में किसी भी प्रकार बाध्क नहीं है।

(लेखक विश्व हिन्दू धर्म सुरक्षा मंच के राष्ट्रिय संयोजक है)

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