Monday, August 8, 2022
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दंत-क्षरण क्या है आइए जानते है मुख एव दंत रोग विशेषज्ञ डॉ .शालू के साथ

दंत-क्षरण क्या है आइए जानते है मुख एव दंत रोग विशेषज्ञ डॉ .शालू के साथ !डॉ शालू मुख दंत रोग विशेषग्य के साथ साथ एक अच्छी कास्मो सर्जन भी है !

दंत क्षरण, जिसे दंत-अस्थिक्षय या छिद्र भी कहा जाता है, एक बीमारी है जिसमें जीवाण्विक प्रक्रियाएं दांत की सख्त संरचना (दन्तबल्क, दन्त-ऊतक और दंतमूल) को क्षतिग्रस्त कर देती हैं। ये ऊतक क्रमशः टूटने लगते हैं, जिससे दन्त-क्षय (छिद्र, दातों में छिद्र) उत्पन्न हो जाते हैं। दन्त-क्षय दो जीवाणुओं के कारण प्रारंभ होता है: स्ट्रेप्टोकॉकस म्युटान्स (Streptococcus mutans) और लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) . यदि इसका इलाज न किया गया तो, इस बीमारी के परिणामस्वरूप दर्द, दांतों की हानि, संक्रमण और चरम स्थितियों में मृत्यु तक हो सकती है। वर्तमान में, दंत-क्षय पूरे विश्व में सबसे आम बीमारी बना हुआ है। दंत-क्षय के अध्ययन को क्षय-विज्ञान (Cariology) कहा जाता है।

डॉ.शालू

क्षयों की प्रस्तुति में अंतर हो सकता है; हालांकि, जोखिम कारक और विकास के चरण एक समान होते हैं। प्रारंभ में यह एक छोटे खड़ियामय क्षेत्र के रूप में प्रतीत हो सकता है, जो अंततः एक बड़े छिद्र के रूप में विकसित हो जाता है। कभी-कभी क्षय को प्रत्यक्ष रूप से देखा भी जा सकता है, हालांकि दांतों के कम दर्शनीय भागों के लिये व क्षति के विस्तार का आकलन करने के लिये इसकी पहचान की अन्य विधियों, जैसे रेडियोग्राफ, का प्रयोग किया जाता है।

दन्त-क्षय अम्ल-उत्पन्न करने वाले एक विशिष्ट प्रकार के जीवाणुओं के कारण होता है, जो कि किण्वन-योग्य कार्बोहाइड्रेट्स, जैसे सुक्रोज़ (sucrose), फ्रुक्टोज़ (fructose) और ग्लूकोज़ (glucose) की उपस्थिति में दांतों को क्षति पहुंचाते हैं।दांतों की खनिज सामग्री लैक्टिक अम्ल के कारण होने वाली अम्लता-वृद्धि के प्रति संवेदनशील होती है। विशिष्ट रूप से, एक दांत (जो कि मुख्यतः खनिज से मिलकर बना होता है) में दांत व लार के बीच अखनीजीकरण (demineralization) और पुनर्खनीजीकरण (remineralization) की एक सतत प्रक्रिया चलती रहती है। जब दांत की सतह पर पीएच (pH) 5.5 से नीचे चला जाता है, तो पुनर्खनीजीकरण की तुलना में अखनीजीकरण अधिक तेज़ी से होने लगता है (जिसका अर्थ यह है कि दांत की सतह पर खनिज संरचना में शुद्ध हानि हो रही है)।

इसके परिणामस्वरूप दांत का क्षरण होता है। दांत के क्षरण के विस्तार के आधार पर, दांत को पुनः उपयुक्त स्वरूप, कार्य व सौंदर्य में वापस लाने के लिये विभिन्न उपचार किये जा सकते हैं, लेकिन दांत की संरचना की बड़ी मात्रा की पुनर्प्राप्ति के लिये कोई ज्ञात विधि उपलब्ध नहीं है, हालांकि स्टेम-सेल संबंधी अनुसंधान ऐसी एक विधि की ओर संकेत करते हैं। इसके बजाय, दंत स्वास्थ्य संगठन दंत क्षय से बचाव के लिये नियमित मौखिक स्वच्छता और आहार में परिवर्तन जैसे निवारक और रोगनिरोधक उपायों का समर्थन करते हैं।

अवस्थिति

सामान्यतः स्थिति के आधार पर वर्गीकरण करने पर क्षति के दो प्रकार होते हैं: चिकनी सतह पर मिलने वाली क्षति और गड्ढों व दरारों में मिलने वाली क्षति. चिकनी सतह पर होने वाली क्षति का स्थान, विकास और श्रेणी गड्ढों व दरारों में होने वाली क्षति से भिन्न होता है। जी. वी. ब्लेक (G.V. Black) ने एक वर्गीकरण प्रणाली विकसित की, जिसका प्रयोग व्यापक पैमाने पर किया जाता है और जो दांत में हो रहे क्षय की स्थिति पर आधारित है। मूल वर्गीकरण में दंत-क्षयों को पांच समूहों में रखा गया था, जिन्हें शब्द “श्रेणी (Class)” तथा एक रोमन अंक के द्वारा सूचित किया जाता था। गड्ढों व दरारों में होने वाले क्षय को श्रेणी I के रूप में सूचित किया जाता है; चिकनी सतह पर होने वाली क्षति को आगे श्रेणी II, श्रेणी III, श्रेणी IV व श्रेणी V में विभाजित किया गया है।दंत-क्षय के ब्लेक के वर्गीकरण में एक श्रेणी VI भी जोड़ा गया था और यह भी चिकनी सतह पर होने वाली क्षति का प्रतिनिधित्व करता है।

गड्ढों व दरारों में होने वाला क्षरण (श्रेणी I दंत-क्षय)

गड्ढे व दरारें दांत पर स्थित संरचनात्मक चिह्न हैं, जहां से दन्तबल्क (enamel) भीतर की ओर मुड़ता है। दरारों का निर्माण खांचों (grooves) के विकास के दौरान होता है, लेकिन उस स्थान पर स्थित दन्तबल्क पूरी तरह जुड़ा हुआ नहीं होता। इसके परिणामस्वरूप, दन्तबल्क की सतह की संरचना पर एक गहरा रेखीय गड्ढा बन जाता है, जो दंत-क्षय को विकसित होने व पनपने के लिये एक स्थान प्रदान करता है। दरारें अधिकांशतः पश्च (पिछले) दांतों की संरोधक (चबाने वाली) सतह और जंभिका पर स्थित अग्र (अगले) दांतों की तालव्य सतह पर स्थित होती हैं। गड्ढे छोटे, सुई की नोक के आकार के छिद्र होते हैं, जो अधिकांशतः खांचों के छोर या अनुप्रस्थ भाग (cross-section) पर पाए जाते हैं। विशिष्ट रूप से, चर्वणक (molar) दांतों की बाहरी सतहों पर कपोल गड्ढे (buccal pits) पाए जाते हैं। सभी प्रकार के गड्ढों व दरारों के लिये अत्यधिक गहराई तक मुड़ा हुआ दन्तबल्क इन सतहों पर मौखिक स्वास्थ्य का ध्यान रख पाना कठिन बना देता है, जिसके कारण इन क्षेत्रों में दंत-क्षति विकसित होना अधिक आम है।

दांतों की संरोधक परत दांत की कुल परत का 12.5% होती है, लेकिन कुल दंत-क्षयों का 50% से अधिक भाग इन्हीं पर पाया जाता है।कुल दंत-क्षयों का 90% बच्चों के दांतों के गड्ढों व दरारों में होने वाली क्षतियां होती हैं।] गड्ढों व दरारों में होने वाले क्षरण की पहचान कर पाना कभी-कभी कठिन हो सकता है। जैसे-जैसे क्षरण में वृद्धि होती जाती है, दांत की सतह के सबसे पास स्थित दन्तबल्क का क्षय क्रमशः गहराई में फैलने लगता है।

एक बार जब यह क्षय दन्त-ऊतक और दन्तबल्क के संयोजन-स्थल (dentino-enamel junction) (डीईजे) (DEJ) के दन्त-ऊतक पर पहुंचता है, तो यह क्षरण तेज़ी से पार्श्विक रूप से फैलता है। दन्त-ऊतक के भीतर, यह क्षरण एक त्रिभुज पैटर्न का पालन करता है, जिसकी दिशा दांत के गूदे की ओर होती है। क्षरण के इस पैटर्न का वर्णन विशिष्ट रूप से दो त्रिभुज (एक तिकोन दन्तबल्क में और दूसरा दन्त-ऊतक में) के द्वारा किया जाता है, जिनके आधार डीईजे (DEJ) पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। चिकनी सतह पर होने वाले क्षरण (जिसमें दो त्रिभुजों के आधार व शीर्ष जुड़े होते हैं) के विपरीत आधार-से-आधार का यह पैटर्न एक गड्ढे व दरार के क्षरण का विशिष्ट पैटर्न है।

चिकनी सतह पर होने वाला क्षरण[

चिकनी सतह पर होने वाले क्षरण के तीन प्रकार होते हैं। समीपस्थ क्षरण, जिसे अंतःसमीपस्थ क्षरण भी कहा जाता है, समीपस्थ दांतों के बीच की चिकनी सतह पर होता है। मूल क्षरण दांतों की मूल सतहों पर होता है। चिकनी सतह पर होने वाला तीसरे प्रकार का क्षरण दांत की किसी भी अन्य चिकनी सतह पर होता है।

समीपस्थ क्षरण की पहचान करना सर्वाधिक कठिन होता है। अक्सर इस प्रकार के क्षरण की पहचान केवल देखकर या दंत अन्वेषक के द्वारा मानवीय रूप से नहीं की जा सकती. समीपस्थ क्षरण दो दांतों के संपर्क-स्थल के ठीक नीचे ग्रैव रूप से (दांत के मूल की ओर) निर्मित होता है। इसके परिणामस्वरूप, शुरुआती चरण में ही समीपस्थ क्षरण की पहचान करने के लिये एक रेडियोग्राफ की आवश्यकता होती है। ब्लेक की वर्गीकरण प्रणाली में, पिछले दांतों (चर्वणक और अग्रचर्वणक) पर उत्पन्न समीपस्थ क्षरण श्रेणी II के क्षरण कहलाते हैं। अगले दांतों (छेदक व रदनक) पर होने वाले समीपस्थ क्षरण में यदि कृंतक छोर (चबानेवाली सतह) शामिल न हो, तो इसे श्रेणी III में रखा जाता है और यदि कृंतक छोर शामिल हो, तो इसे श्रेणी IV में रखते हैं।

मूल क्षरण, जिनका वर्णन कभी-कभी चिकनी-सतह वाले क्षरण के एक प्रकार के रूप में किया जाता है, क्षरण का तीसरा सबसे आम प्रकार हैं और ये सामान्यतः तब उत्पन्न होते हैं, जब मूल सतहें मसूड़ों में घटाव के कारण उजागर हो गईं हों. यदि मसूड़े स्वस्थ हों, तो मूल क्षरण के विकास की संभावना नहीं होती क्योंकि जीवाण्विक प्लाक मूल सतहों तक नहीं पहुंच सकता. दन्तबल्क की तुलना में मूल सतहें अखनिजीकरण प्रक्रिया के प्रति अधिक असुरक्षित होती हैं क्योंकि दन्त-मूल 6.7 पीएच (pH) पर अखनिजीकृत होना प्रारंभ करता है, जो कि दन्तबल्क के नाज़ुक पीएच (pH) से उच्च है। इसके बावजूद, दन्तबल्क क्षरण की अपेक्षा मूल क्षरण के विकास को रोकना अधिक सरल है क्योंकि दन्तबल्क की तुलना में मूल में फ्लोराइड का पुनःअवशोषण अधिक होता है। अंतःसमीपस्थ सतहों की तुलना में, जिहीय सतहों की तुलना में जिह्वीय सतहों पर मूल क्षरण होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। जबड़ों पर स्थित चर्वणक दांत मूल क्षरण के सबसे आम स्थान हैं, जिसके बाद जबड़ों पर स्थित अग्रचर्वणक, जंभिका पर स्थित अग्रवर्ती, जंभिका पर स्थिति पश्चवर्ती और जबड़े पर स्थित अग्रवर्ती दांत आते हैं।

दांतों की चिकनी सतहों पर चोट लग जाना भी संभव है। चूंकि ये अंतःसमीपस्थ क्षेत्रों के अलावा चिकनी सतह के सभी क्षेत्रों में होती हैं, अतः इस प्रकार के क्षरण की पहचान करना सरल होता है और ये प्लाक तथा क्षरण के निर्माण को प्रोत्साहित करने वाले भोजन से जुड़े होते हैं।] ब्लेक के वर्गीकरण के अंतर्गत, आननमुखीय अथवा जिहीय सतहों के पास स्थित मसूड़ों पर होने वाले क्षरण को श्रेणी V के रूप में चिह्नित किया जाता है। श्रेणी VI पश्चस्थ दांतों के सिरों और अग्रस्थ दांतों के कृंतक छोरों के लिये आरक्षित है।

अन्य सामान्य विवरण]

पूर्व वर्णित दो श्रेणियों के अलावा, क्षरणग्रस्त चोट को एक दांत की किसी विशिष्ट सतह पर उनकी स्थिति के द्वारा भी वर्णित किया जा सकता है। दांत की जो सतह गालों या होठों से सबसे निकट होती है, उन पर होने वाले क्षरण को “आननमुख क्षरण (“facial caries”) कहा जाता है और जीभ की ओर स्थित सतह पर होने वाला क्षरण, जिहीय क्षरण (“lingual caries”) कहलाता है। आननमुख क्षरण को आगे कपोल (जब यह गालों के पास स्थित पश्चस्थ दांतों की सतहों पर प्राप्त हुआ हो) और ओष्ठक (जब यह होठों के सबसे निकट स्थित अग्रस्थ दांतों की सतहों पर प्राप्त हुआ हो में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि ओष्ठक क्षरण जंभिका पर स्थित दांतों की ओष्ठक सतहों पर पाया गया हो, तो इसका वर्णन तालव्य के रूप में किया जा सकता है क्योंकि ये दांत सख्त तालू के बगल में स्थित होते हैं।

किसी दांत की ग्रीवा-वह स्थान जहां दांत का शीर्ष-भाग और मूल जुड़ते हैं-के पास क्षरण को ग्रैव क्षरण (cervical caries) कहा जाता है। संरोधक क्षरण पश्चस्थ दांतों की चबाने वाली सतहों पर पाया जाता है। कृंतक क्षरण अग्रस्थ दांतों की चबाने वाली सतहों पर पाया जाता है। क्षरणों का वर्णन “मध्यम (mesial)” अथवा “दूरस्थ (distal)” के रूप में भी किया जा सकता है। मध्यम क्षरण दांतों पर किसी ऐसे स्थान से संबंधित होते हैं, जो चेहरे की मध्य-रेखा के निकट हो, जो कि आंखों के बीच से नीचे नाक की ओर और मध्य कृंतकों के संपर्क के बीच की ऊर्ध्व धुरी पर स्थित होती है। मध्य रेखा से दूर स्थित दांतों की स्थिति का वर्णन दूरस्थ के रूप में किया जाता है।

हेतुविज्ञान(Etiology)
कुछ उदाहरणों में, क्षयों का वर्णन किसी अन्य प्रकार से भी किया जाता है, जो इसके कारण की ओर सूचित करता हो। “शिशु बोतल क्षरण”, “प्रारंभिक शैशव क्षरण” अथवा “शिशु बोतल दांत क्षरण” अस्थायी (शिशु) दांतों वाले छोटे बच्चों में पाया जाने वाला एक पैटर्न है। इसमें जबड़ों के अग्र-भाग पर स्थित दांतों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ने की संभावना होती है, लेकिन सभी दांत प्रभावित हो सकते हैं। इस प्रकार के क्षरण को यह नाम इस तथ्य के आधार पर मिला है कि यह क्षरण सामान्यतः शिशुओं को उनकी बोतल में रखे मीठे द्रवों के साथ सोने की अनुमति देने अथवा शिशुओं दिन में कई बार मीठे द्रव पिलाने के परिणामस्वरूप होता है। क्षरण का एक अन्य पैटर्न “अत्यधिक फैलनेवाला क्षरण (rampant caries)" है, जो अनेक दांतों की कई सतहों पर होने वाले उन्नत या अत्यधिक क्षरण को सूचित करता है.
    अत्यधिक फैलनेवाला क्षरण मुंह सूखने की बीमारी (xerostomia) से ग्रस्त, मुंह के स्वास्थ्य का ध्यान न रखने वाले, उत्तेजक का प्रयोग (ड्रग से प्रभावित सूखे मुंह के कारण) करने वाले तथा/या चीनी का बहुत अधिक सेवन करने वाले व्यक्तियों में देखा जा सकता है। यदि अत्यधिक फैलनेवाला क्षरण सिर व गरदन पर पूर्ववर्ती विकिरण के कारण हो, तो इसका वर्णन विकिरण-प्रभावित क्षरण के रूप में किया जा सकता है। ये समस्याएं मूल के स्वतःविनाश और जब नये दांत उग रहे हों, तो पूरे दांत की पुनर्रचना या बाद में अज्ञात कारणों से उत्पन्न हो सकती हैं। "दंत-क्षरण एक रासायनिक-परजीवी प्रक्रिया है, जिसमें दो चरण होते हैं-दन्तबल्क का अखटीकरण (decalcification), जिसके परिणामस्वरूप पूर्ण विनाश होता है, तथा प्राथमिक चरण के रूप में दन्त-ऊतक का अखटीकरण (decalcification), जिसके बाद मुलायम हो चुका अवशिष्ट का विलयन होता है।

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