Monday, January 17, 2022
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वारुणी और सोमरस तथा शराब प्रायः एक ही अर्थों में लिए जाते हैं जबकि इनके सूक्ष्म अन्तर को समझ लेना चाहिए

वारुणी और सोमररस


ब्रह्मलीन जीवनमुक्त परम श्रद्धेय स्वामी राम सुखदास जी ने श्रीमद्भगवद्गीता की अपनी ‘साधक सञ्जीवनी’ नामक अनुपम टीका में लिखा है कि सोमरस जिसे देवता लोग पान करते थे वह आजकल की शराब नहीं है ।इसकी आँड़ लेकर लोक कुतर्क करने लगते हैं कि जब देवता लोग सोमरसपान करते थे तो हम शरीबा क्यों नहीं पी सकते ?वगैरा वगैरा ।
तो ,स्वामी जी ने यह बताया कि एक लता होती है जिसके पत्ते सोम यानी चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार कृष्ण पक्ष में एक-एक करके 15 दिन में झड़ जाते हैं औरपुनः शुक्ल पक्ष में क्रमशः नव पल्लव निकल आते हैं ।उसका संबंध चन्द्रमा की कलाओं से होता है ।चन्द्रमा को सोम भी कहा जाता है ।

इसीलिए चन्द्रवार या सोमवार दोनों शब्द अँग्रेजीके Monday के लिए प्रयुक्त होते हैं ।सोम और चन्द्रमा परस्पर पर्याय हैं ।चूँकि सोम लता का संबंध सोम(चन्द्रमा)से है,इसीलिए इसे सोमलता कहा जाता है और सोमलता से निकलने वाले रस को सोमरस कहते हैं जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है ।यही कारण है कि चन्द्रमा को औषधियों का पति कहाजाता है ( “ओषधीनाम् पतिः।”)

आइये हम यहाँ ‘ओषधि’ और ‘औषधि’ का अन्तर समझ लेते हैं।
शान्ति मव्त्र में भी “ॐ द्यौः शान्तिः………शान्तिरोषधयः*……. पद आया है शान्तिरौषयः नहीं है ।
अस्तु,जो प्राकृतिक रूप से जड़ी बूटी होती है उसे ‘ओषधि’ कहा जाता है और जब उसे कूटकर ,छानकर,अरिष्ट या आसव बनाकर ,यानी संस्कारित करके खाने-पीने लायक टैबलेट,चूर्णादि के रूप में बना देते हैं ,तब वह औषधि बन जाती है ।
तो,यह सोमलता ओषधि है और सोमरस औषधि है जिसे देवतागण ग्रहण करते हैं।
रही बात वारुणी की तो उस पर आगे नीचे बहुत विचार किया गषा है जिसमें हमारे एक मित्र का योगदान भी सराहनीय है।
मदपान को शास्त्रों में बहुत बुरा माना गया है ।यहाँ तक कि इस्लाम में भी शराब को हराम कहा गया है ।जिस समय मोहम्नद साहब लोगों को धर्म की शिक्षा दे रहे थे ,तब वहाँ लगभग सभी शराब के नशे में धुत रहते थे ।अतः उन्होंने परिसंख्यावाद (यानी शनैःशनैः सुधारवाद)का रास्ता अपनाया ।पहले कह दिया कि ठीक है शराब जायज है ताकि लोग बिदक न जाएँ क्योंकि शराबी की शराब छुड़ाकर और अन्य सभी सुधार एक साथ लागू करना बड़ा कठिन कार्य था किन्तु कुछ दिनों बाद कहा कि “शराब कभी-कभी जायज है और अन्त में घोषणा कर दी कि “शराब हमेशा हराम है । फिर भी जो शराब पीते हैं,वे इस्लाम के लिरुद्ध आचरण करते हैं।
शराब के नशे में कितने घर बरबाद हो गए।ऐसे मेरे सामने नीलगाँव स्टेट से लेकर बहुतेरे राजा-महाराजाओं व जनसामान्य की नजीरें हैं जो नशे में ही बरबाद हो गए और अपना समूल विनाश कर लिया ।विषय विस्तारभय से हम उनका उल्लेख नहीं कर रहे हैं।
तुलसी बाबा ने तो डंके की चोब पर पदे-पदे मदपान की निन्दा की है-
जिन्ह कृत महामोह मदपाना।
तिन्ह कहा करिय नहिं काना।।”

बातुल भूत बिबस मतवारे ।
ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।

“सुरसरि जलकृत #बारुनि#जाना।
कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।
।”

सुरसरि मिले सो पावन कैसे।
ईस अनीसहि अंतरु तैसे।।”

……
“जौं असि हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ,जीव कि ईस समान।।”

बिप्र बिबेकी बेदबिद सम्मत साधु सुजाति।
जिमि धोखे मदपान किय ,सचिव सोच तेहि भाँति।
।”

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
ताहि पियाइय #बारुनी#कहहु काह उपचार।
।”
………आदि आदि।
अधिकांश संज्ञेय अपराध नशे में ही होते हैं।कानून भी नशे की हालत में किए हुए अपराध में कोई रियायत नहीं करता ।एक बारात में पंक्ति में बैठने को लेकर विवाद हो गया ।नतीजन एक पिस्तौलधारी ने दूसरे व्यक्ति को गोली मार दी जिससे वह वहीं मर गया।अदालत मेम बचाव पक्ष ने दलील दी कि अभियुक्त नशे में होने से होश मेम नथा जिससे यह अपराध हो गया किव््तु अदालत ने कहा कि नशई को भी उतना ही ज्ञान रहता है जितना एक सानान्य व्यक्ति को ।अतः नशे का बहाना लेकर मुजरिम को मुल्जिम बनने से बचाया नहीं जा सकता ।परिणामतः उसे भारतीय दंड संहिता के नियमानुसार सजा सुनाई गई ,ऐसा मैंने कानून की किताबों में पढ़ा है जिसका साइटेशन सम्प्रति मेरे स्मृतिपटल से ओझल हो रहा है।
सुरापायी ब्राह्मण ही क्यों न हो फिर भी उसके हाथ का जल नहीं पीना चाहिए ,ऐसा शास्त्रों का मत है ।
अब हम इतना इंगित करने के बाद मदपान और शास्त्रीय मत में अधिक न उलझकर कुछ नामी गिरामी कथावाचकों द्वारा बलरामादि द्वारिकावासियों के वारुणीपान के बिन्दु पर संक्षिप्त विचार करना चाहते हैं ।
भागवत में बलराम जी के लिए वारुणी पीने की बात आई है । किन्तु मूर्ख लोग उस शब्द का अर्थ आजकल प्रयोग में ली जाने वाली शराब से करते है जबकि उसका अर्थ यह नही है । श्रीबलराम जी के द्वारा मद्यपान (वारुणी पान) किया गया किन्तु उसका रहस्य इस प्रकार है बिना समझे लोग अर्थ का अनर्थ कर रहे है ।

प्रायः सभी शास्त्रीय ग्रन्थो में व्यापकता से मदिरापान की निंदा की गई है। हां, कुछ औषधीय प्रयोगों में इसे ग्राह्य बताया गया है किंतु वहां भी इसे श्रेष्ठ नहीं कहा गया है। इसका कारण है।
शार्ङ्गधर संहिता के पूर्वखण्ड,के अध्याय – ०४, श्लोक – २१ में लिखा गया है
“बुद्धिं लुम्पति यद्रव्यं मदकारि तदुच्यते।
तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम्।।”

अर्थात -जो द्रव्य बुद्धि का नाश कर दे, उसे तमोगुण की प्रधानता के कारण मदकारक कहते हैं, जैसे मद्य, सुरा आदि।

मद्य, मधु, सुरा, मदिरा आदि ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। इनका अर्थ है, मदहोश करने वाला। जैसे प्याज़, शलगम आदि भी सब्जी है और लौकी, पपीता आदि भी। किन्तु प्याज़ आदि ग्राह्य नहीं है, और पपीता आदि ग्राह्य है। वैसे ही मधु या सुरा की श्रेणी में शराब, शहद, शर्बत, यहां तक कि अमृत आदि सब आ जाएंगे। उनमें से कुछ ग्राह्य हैं, कुछ नहीं। यथा, स्त्रीरमण शब्द का अर्थ पत्नी से रमण ही होता है। माता भी स्त्री ही कहाएंगी, किन्तु वहाँ पत्नी वाला भाव नहीं रहेगा। तो जैसे स्त्री एक जातिवाचक शब्द है, उसमें माता-पत्नी-बहन आदि ग्राह्य अग्राह्य भेद हैं, वैसे ही मधु, सुरा आदि जातिवाचक हैं जिसमें ग्राह्य एवं अग्राह्य श्रेणी हैं। आयुर्वेदिक ग्रंथों में सुरा से रोगों की चिकित्सा का व्यापक वर्णन है।

“यदा नाडी भवेत्क्षीणा रोगेऽस्मिन् भिषजा तदा।
सजला बललाभाय मृतसञ्जीवनी सुरा॥”
(भैषज्य-रत्नावली, अध्याय – ९९, श्लोक – ०६)

बलराम जी केवल वारुणी नाम का ही पेयविशेष ग्रहण करते थे, किसी अन्य मदिरा आदि का नहीं। वारुणी को किस ऋतु में पिये, किस रोग में सेवन करके, इसके कुछ सामान्य उदाहरण देखें –

वाग्भट संहिता के चिकित्सास्थान का वचन है –
“स्नेहाढ्यैः सक्तुभिर्युक्तां लवणां वारुणीं पिबेत्॥”

सुश्रुत संहिता के उत्तर तन्त्र का वचन है –
“सुसंस्कृताः प्रदेयाः स्युर्घृतपूरा विशेषतः।
वारुणीं च पिबेज्जन्तुस्तथा संपद्यते सुखी॥”

“शीतलत्वादृतोश्चापि न तावत्परिभिद्यते।
तस्मात्तैलगुडोपेतां वारुणीं शिशिरे पिबेत्॥”
(भेल संहिता, विमान स्थान, अध्याय – ०६, श्लोक – २०)

बलराम जी स्वयं परम् योगेश्वर हैं। वे योगबल से भी वारुणीपान कर सकते हैं, अतएव उनमें सामान्य पतित मद्यप की भावना का आधान उचित नहीं है।

“कपालमुद्रां वारुणीं पिबामि।”
(हाहाराव तन्त्र)

मैं (साधक) कपालमुद्रा (चक्रस्थित बिंदुविशेष) वाली वारुणी को पीता हूँ।

ओंकार की जो अंतिम बिंदुमात्रा है, उसे भी वेदों में वारुणी कहा गया है।

परमा चार्धमात्रा या वारुणीं तां विदुर्बुधाः॥”
(नादबिन्दूपनिषत्)

रुद्रयामल तन्त्र का वचन है –

कलासप्तदशप्रोक्ता अमृतं स्राव्यते शशि:।
प्रथमा सा विजानीयादितरे मद्यपायिनः॥

चंद्रमा की (लौकिक सोलह एवं यौगिक एक के साथ कुल) सत्रह कलाएं हैं जिनसे वह अमृत टपकाता है। उसे ही (पञ्चमकार में) प्रथम जानना चाहिए। उसका ही सेवन करने वाला तन्त्र में मद्यप है, अन्यथा सामान्य शराबी तो बहुत से हैं।

इस प्रकार से वारुणी शब्द का, उस वारुणी मद्य का, यौगिक, तांत्रिक एवं वैदिक अर्थ यह सिद्ध करता है कि योग, तन्त्र एवं वेदों के परम उपास्य श्रीबलरामजी वारुणीपान करते हुए भी लौकिक व्यसनियों की भांति निंद्य नहीं है। शतपथब्राह्मण में “अन्नं सुरा……” आदि भी आया है।

“गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
यथैवैका तथा सर्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः ॥”

(मनुस्मृति, विष्णुस्मृति, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, वैखानस गृह्यसूत्र)

उपर्युक्त श्लोक से सुरा के गौडी, पैष्टी एवं माध्वी, इन तीन प्रकार की सुरा का वर्णन है जो द्विजातियों के लिए सर्वथा त्याज्य है।
नारद पुराण निर्माणद्रव्य के भेद से इनके ग्यारह प्रकार बताता है। कुछ के मत से खजूर से बनी हुई मदिरा का नाम वारुणी है।
“तालं च पानसं चैव द्राक्षं खार्जूरसंभवम्॥
माधुक शैलमारिष्टं मैरेयं नालिकेरजम्।।
“गौडी माध्वी सुरा मद्यमेवमेकादश स्मृताः॥”

(नारदपुराण, पूर्वार्द्ध, अध्याय – ३०, श्लोक – ३०-३१)

कुछ लोग अधिक बड़े धर्मरक्षक बनने के फेर में कहते हैं कि बलराम जी ने वारुणी पान किया ही नहीं है। यह बात सर्वथा अनुचित है। बलराम जी निःसन्देह वारुणी पान करते थे।

“गायन्तं वारुणीं पीत्वा मदविह्वललोचनम् ।
विभ्राजमानं वपुषा प्रभिन्नमिव वारणम् ॥”

(श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध – १०, अध्याय – ६७, श्लोक – १०)

बलराम जी के नेत्र मद से चञ्चल हो रहे थे, वे वारुणी का पान करके गा रहे थे एवं उनके व्यक्तित्व की शोभा मदमस्त हाथी के समान हो रही थी। (यह प्रसङ्ग उस समय का है जब वे विहार के लिए रैवतक पर्वत पर गए थे और उन्होंने बाद में द्विविद का वध किया था।)

आगे वर्णन है –

“अथ वरुणप्रेषिता वारुणी देवी पुष्पभारगंधलोभिमिलिंदनादितवृक्षकोटरेभ्यः पतन्ती सर्वतो वनं सुरभीचकार ॥”

अब हम देखते हैं कि वारुणी कहते किसे हैं। बलराम जी वारुणी ही क्यों पीते थे, वारुणी कितने प्रकार की है, उसके निर्माण की विधि क्या है, उसके सेवन का क्या प्रभाव है, आदि आदि …

“अन्नादिसम्भवो योऽर्कस्तन्मद्यं परिकीर्तितम्॥”

अन्न इत्यादि के द्वारा जो अर्क बनता है, उसे मद्य कहा जाता है। शिव जी ने रावण को तंत्रायुर्वेद ग्रंथों में कई प्रकार के मद्य का उपदेश करके करके अंत में कहा –

“शालिपेठकपिष्ट्यादिकृतो योऽर्कः सुरा तु सा
पुनर्नवाशिवापिष्टैर्विहिता वारुणी स्मृता॥”

(रसकामेश्वरी दिव्यचिकित्साखण्ड, अध्याय – ०५ अथवा सुराकल्पामृतयोग नामक प्रथम पटल, श्लोक – ०९)

चावल एवं पेठे की पिष्टी बनाकर जो अर्क निकाला जाता है, उसे सुरा कहते हैं। पुनर्नवा एवं हरड़ को पीसकर उसकी पिष्टी से निकाला गया अर्क वारुणी कहलाता है।

रावण को शिव जी ने सौ से अधिक प्रकार के अर्क एवं मद्य के निर्माण की विधि बताई है। इसी बात में रावण ने मन्दोदरी को बताते हुए कहा है –

“पुनर्नवाशिलापिष्टैर्विहिता वारुणी च सा।
संहितैतालखर्जूररसैर्या सा च वारुणी॥”

(दिव्यौषधि कल्प, मद्यप्रकरण, पटल – ११, श्लोक – ५९)

पुनर्नवा को पत्थर पर पीस कर, उससे बनने वाले मद्य को वारुणी कहते हैं।ताड़ एवं खजूर के रस से जो मद्य बनता है, उसको भी वारुणी कहते हैं। (आजकल भी आयुर्वेद-ग्रंथों के आधार पर पुनर्नवारिष्ट अथवा द्राक्षासव बनाते और सेवन किये जाते हैं, जो शरीर में बल, वीर्य, ओज, रक्त आदि की वृद्धि करते हैं, इनकी भी तन्त्रमत में वारुणी संज्ञा है)

“पर्यायाद्यो भवेन्मद्यस्तामसो राक्षसप्रियः।
मंडादि राजसो ज्ञेयस्ततो वै सात्विको भवेत्॥”

“सात्विकं गीतहास्यादौ राजसं साहसादिके।
तामसे निंद्यकर्माणि निद्रां च बहुधा चरेत्॥”
(रसकामेश्वरी दिव्यचिकित्साखण्ड, अध्याय – ०५, सुराकल्पामृतयोग नामक प्रथम पटल, श्लोक – ११-१२)

बारम्बार एक ही तत्व को धर्षित करके बनाए गए (अथवा अत्यधिक मात्रा में सेवन किये गए) को तामसी मद्य कहते हैं। मांड आदि से बनाये गए (मतांतर से कभी कभी लिए गए) मद्य को राजसी कहते हैं। इसके अतिरिक्त शेष (औषधि आदि से निर्मित, संवित्शक्ति को देने वाले) मद्य को सात्विक कहते हैं। सात्विक मद्य का प्रयोग गीत, हास्य, विलास आदि में होता है। साहस, युद्ध इत्यादि के कार्य में राजस मद्य का प्रयोग होता है। शेष निंद्य कर्म तथा निद्रा आदि को प्रदान करने वाले कर्म में तामसी मद्य का प्रयोग होता है।
*वारुणी के दो अन्य पर प्रभेद भी होते हैं – *
(1)राजवारुणी
एवं
(2)क्षुद्रवारुणी।

👉 राजवारुणी के निर्माण की विधि बताते हैं –

शुण्ठी कणा कणामूलं यवानी मरिचानि च।
“तुल्यान्येतानि सर्वाणि एभ्यो द्विध्नोऽम्नलो रजः।
प्रोक्तान्तर्गतदिक्कान्नं स्वादुसंख्या नखोन्मिता।।
सर्वेभ्यो द्विगुणं स्वादं स्थापयेन्मासमात्रकम्।
कुर्यादष्टप्रहरकं प्रत्यहं च ततः पुनः॥
ततो निष्कासयेदर्कं सुरेयं राजवारुणी।
.मासं भूमौ निखातव्या तत ऊर्ध्वं च भक्षयेत्॥”

(रसकामेश्वरी दिव्यचिकित्साखण्ड, अध्याय – ०५, सुराकल्पामृतयोग नामक प्रथम पटल, श्लोक – २३-२६)

अर्थात् सोंठ, पीपर, पिपरामूल, अजवायन एवं काली मिर्च को समान भाग में लेकर कूट लें और दोगुने अम्ल (मट्ठा, विनेगर, इमली पानी आदि) में मिलाएं। फिर इसमें दस प्रकार की शहद एवं बीस प्रकार के गन्ने का रस मिलाएं। (कुछ वैद्य इसमें आठ प्रकार की शहद एवं बारह प्रकार के गन्ने का रस मिलाते हैं) इसके बाद इन सबसे दोगुना गुड़ मिलाकर एक महीने तक घड़े में, प्रतिदिन आठ प्रहर दिन के धूप में रखें। उसके बाद इसका अर्क निकाल लें, इसे ही राजवारुणी कहते हैं। इसे पुनः एक महीने तक घड़े में बंद करके, ढ़ककर मिट्टी में दबा दें। एक महीने के बाद खोदकर निकालें एवं सेवन करें।

अब इस राजवारुणी के पान से क्या लाभ होता है, उसका विवेचन करते हैं

“इयं शीता लघु: स्वाद्वीस्निग्धा ग्राही विलेखनी।
चक्षुष्या दीपनी स्वर्या व्रणशोधनरोपणी॥
सौकुमार्यकरा सूक्ष्मा परं स्रोतोविशोधनी।
कषाया च रसाह्लादा प्रसादजनका परा॥
वर्ण्या मेधाकरी वृष्या तथारोधकतां हरेत्।
कुष्ठार्श: कासपित्तास्रकफमेहक्लमकृमीन्॥
मेदतृष्णावमिश्वासहिक्कातिसारविड्ग्रहान्।
दाहक्षतक्षयायैवं योगवाह्याऽम्लवातला॥”

(रसकामेश्वरी दिव्यचिकित्साखण्ड, अध्याय – ०५, सुराकल्पामृतयोग नामक प्रथम पटल, श्लोक – २७-३०)

👉 यह राजवारुणी शीतल, हल्की, मीठी, चिकनी स्वभाव की, पतले दस्त को ठीक करने वाली, नेत्रों की ज्योति बढ़ाने वाली, भूख जगाने वाली, कण्ठ को मधुर करने वाली, घाव-जख्म आदि भरने वाली, शरीर को सुन्दर एवं सुकुमार बनाने वाली, नाड़ियों में रक्तप्रवाह को सुधारने वाली, शारीरिक कान्ति बढ़ाने वाली, धारणा शक्ति और वीर्य को पुष्ट करने वाली, अरुचि का नाश करने वाली, कुष्ठ, अर्श (बवासीर), खांसी, रक्तपित्त, कफ, प्रमेह, थकावट, कृमि, मेदा रोग, अत्यधिक प्यास या उल्टी, श्वास रोग, हिचकी, अतिसार, कब्ज, जलन, बदहज़मी एवं क्षयरोग को दूर करने वाली है।

अब इससे कुछ सामान्य गुणों वाली क्षुद्रवारुणी की विधि एवं प्रभाव पर ध्यान दें –

“कंगुश्चीणा कोद्रवश्च श्यामाको वनकोद्रव:।
शणबीजं वंशबीजं गवेध्रुश्च प्रसाधिका॥
यावन्त्येतानि चोक्तानि तुषधान्यानि वेधश:।
सर्वे संतुट्य यत्नेन वितुषीकृत्य यत्नतः॥
तक्रे वा क्वचिदम्ले वा आकीटं तद्विनि:क्षिपेत्।
ततो निष्कासयेन्मद्यं भवेत्सा क्षुद्रवारुणी॥
मण्डलार्धं तु भोक्तव्या बहुक्लेशकरैर्नरै:।
क्षुधा तृषा च चिन्ता च पर्वतारोहणादिकम्॥
एतत्स सेवितो नास्ति महाभारवहोऽपि वा।
सूता समुपवेष्टा चेज्जयेत् प्रसववेदनाम्॥”
(रसकामेश्वरी दिव्यचिकित्साखण्ड,
अध्याय – ०५ अथवा सुराकल्पामृतयोग नामक प्रथम पटल, श्लोक – ३१-३५)

माने  कँगुनी, चीना (सम्भवतः रामदाना), कोदो, साँवा, बनकोदो, सन के बीज, बांस के बीज (करील के उद्भवकण), गड़हेरुआ और प्रसन्धिका, ये सभी क्षुद्र धान्य कहलाते हैं। अब सबको अच्छे से कूटकर भूसी निकाल लें और मट्ठे या दूसरी (दोगुनी) खटाई में डाल दें। जब इसमें किण्वन (Fermentation) हो जाये तो अर्क निकाल लें। यह मद्य क्षुद्रवारुणी कहलाती है। अधिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों को यह पन्द्रह दिन तक सेवन करनी चाहिए। इसके सेवन से अधिक परिश्रम करने की क्षमता विकसित होती है। पर्वत चढ़ने वालों एवं भार ढोने वालों को कष्ट नहीं होता।बच्चे के जन्म के समय प्रसूता को इसे पिलाने से उसे प्रसवपीड़ा में आराम मिलता है।

आप ध्यान देंगे तो कुछ बातें पाएंगे :-

१) बलराम जी रजोगुणी अथवा मतांतर से तमोगुणी अवतार हैं, जिसके कारण उनके व्यक्तित्व में तमोगुणी अथवा रजोगुणी क्रियोचित वारुणीपान की लीला सामान्य है।

२) बलराम जी का बारम्बार अत्यधिक बलयुक्त कार्य करना, लम्बी यात्राएं करना, रैवतक आदि पर्वतों पर चढ़ना वर्णित है, जिससे हुए लौकिक थकान को वारुणी दूर करती है।

३) बलराम जी पारिस्थितिक वारुणी पान के बाद नृत्य, गीत, संगीत, पर्वतारोहण, और आंशिक रूप से साहसिक युद्धादि कार्य भी करते थे। वे शराबियों की भांति उन्मत्त होकर प्रलाप या असामाजिक गतिविधियों में लिप्त नहीं रहते थे।
इस सन्दर्भ को आप सब ग्रहण करें और इस पर विचार करें । मुझे लगता है कि प्रसिद्ध रामकथा वाचक कहना कुछ इस तरह चाह रहे थे किन्तु प्रमाद वश या प्रसंग वश उनसे कुछ अतिशयोक्ति रूप में विलग भाव की प्रस्तुति हो गयी । हमें लगता है कि उन्होंने अपने कथा प्रसंग में किसी प्रकरण वशात इस कथानक को जोड़ दिया है । यद्यपि भागवत में यह लिखा है बलराम जी वारुणी पीते थे। वह उक्त विधि जो वारुणी की बताई गयी है वह मदिरा हो सकती है किन्तु यह उन सबसे भिन्न है वह वृक्ष के खोडर से अपने आप उत्पन्न होने वाली दिव्य औषधि थी जिसका पान बलराम जी करते थे । इसलिए किसी पर इस सन्दर्भ में दोष नही देना चाहिए । हाँ कुछ कथानक वश अतिशयोक्ति उनके मुख से निकल गये है। जिसके लिए उन्होने क्षमा माँग ली है।अस्तु जो भी आज की शराब और उस वारुणी में प्राय्प्त अन्तर था ।आज तो देशी शराब(ठर्रा)पीकर कितने थोक में मर जाते हैं जिनकी खबरों से अखबार भरे पड़े रहते हैं ।पुलिस कार्यवाही भी करती है ,मुकदमे कायम होते हैं किन्तु नतीजा फिर वही ढाक के तीन पात। वाली लोकोक्ति को चरितार्थ करते हैं ।पिलिस और आबकारी आदि निरोधक विभागों को पैसा देकर गाँवों में फिर से भट्ठियाँ सुलगने लगती हैं।
कुछ लोग तड़ वृक्ष से प्राकृतिक निकाली हुई हाँडी से ताजी ताड़ी पीते हैं किन्तु सूर्योदय के बाद निकाली हुई और पी हुई ताड़ी हमेशा नुकसान ही करती है और इब तो उसमें भी तमाम रसायन मिलाकर उसे भी अपेय बना देते हैं ।लखनऊ मेम तो पुरनिया के पास सीतापुर रोड पर एक जगह ही है ताड़ी खाना जिसके संबंध में पद्मश्री विभूषित शिक्षक इतिहासविद् लेखक स्व. योगेश प्रवीन जी की पुस्तक लखनऊनामा आदि से देखना चाहिए।
अब रही बात कुछ लोग अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं कि जब बलराम पीते थे ,शंकर जी भाँग खाते हैं ,यदुवंशी पीते थे ……आदि आदि तो हम क्यों नहीं पी सकते ? ये सब कुतर्क हैं और इनकी आँड़ में अपने कुकर्मों को ढकने का असफल प्रयास मात्र है ।यदुवंशियों का विवाश हुआ,बलराम से भी नैमिषारण्य में सूतवध हो ही गया।शंकर जी को तो कई बार बिना सोचे समझे असुरों को वरदानदेकर मुसीबत आ पड़ने पर बिना नशे वाले भगवान् विष्णु ने ही आकर मुसीबतों से उनका पिंड छुटाया ,जैसे भस्मासुरादि का वध।
एक तो शास्त्र कहता है-

“यान्यस्नाकं सुचरितानि तानि त्वयेपास्यानि नो इतराणि।”(तैत्तरीयोपनिषद)
यानी जो हमारे अनुकरणीय सुन्दर चरित्र हैं ,उन्ही का अनुकरण करिएगा ,अन्य का नहीं ।
“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत् प्रमाणं क्रियते लोकस्तदनुवर्तते।।”(गीता)
आजकल तो बारातों में मदपान का एक फैशन बना लिए हैं जिससे तमाम झगड़े व अनर्थ हो जाते हैं ,तमाम संस्मरण मेरे सामने हैं जिसमें बलबे हुए,गोलियाँ चलीं लाठियाँ चलीं……किन्तु उनका उल्लेख यहाँ संभव नहीं ।
यहाँ हम जो कहना चाहते हैं वह यह है कि हमें सदैव अच्छे आचरण(सदाचरण)का ही अनुकरण करना चाहिए,दुराचरण का नहीं क्योंकि-
“बिधि प्रपंच गुन अवगुन साना।”
“जड़ चेतन गुन दोषमय विश्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि वारि विकार।।”(तुलसीदासजी)
“सो सुधारि हरिजन इमि लेहीं।
दलि दुख दोष बिमल जसु लेहीं।।”
“साधू ऐसा चाहिए,जैसे सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै,थोथा देइ उड़ाय।।”(कबीरदासजी)
दूसरी बात रही अनुकरण करने की तो क्या हम उनके सभी चरित्रों का अनुकरण कर सकते हैं?
भगवान् शंकर ने कालकूट विष जगद्धिताय पी लिया जो कि पोटेशियम सानाइड से भी अनंतगुना मारक है और नीलकंठ कहलाए।क्या कोई पोटेशियम सानाइड जो उससे कम क्षमता का है,की एक पिन प्वाइंट भर भी अपनी जबान पर लगा सकता है और फिर उसका स्वाद बता सकता है ?कितने वैज्ञानिकों ने एक हाथ में पिन पर यह विष रखा और दूसरे हाथ में पेन कि तुरंत हम स्वाद लिख देंगे किन्तु केवल एक ही लेटर लिख सके S अब एस.से सॉल्ट समझा जाए या स्वीट समझें ,खट्टा,नीठा,नमकीन क्या माना जाए ।वे तो तमाम विषधर लपेटे है ,उनका अनुकरण करने वाले किसी बिच्छू से ही खेलकर देखें ।एक धतूरे का फल ही प्राण हर लेगा।

एक संस्मरण-

     यह बात बीसवीं शताब्दी के अन्तिम  दशक की है ,मैं गोमती नगर , लखनऊ के एक शिक्षण समस्थान में कार्यरत था ।जाड़े का मौसम था ।मध्यावकाश चल रहा था मैं भी धूप में मैदान में आ गया।बच्चे खेल रहे थे ।विद्यालय कक्षा 1 से 12 तक था।एक छठवीं कक्षा के बच्चे पर मधुमक्खियाँ टूट पड़ीं।सब डर कर भाग गए।के.वि.एस.रिटायरीज वाट्सएप ग्रुुप में अभी भी हमारे कुछ पुराने मित्र इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी गवाह हैं किन्तु मुझ से न रहा गया मैंने जाकर उसे बिठाकर ऊपर से छाप लिया जैसे मेरे पिता जी ने हमारी पाँचवी कक्षा का इम्तिहान देकर लौटते समय आँधी तूफान बरसात और एलों से मेरी रक्षा की थी। तब तक तत्कालीन प्राचार्य श्रीसीतारामजी शुक्ल ने बुद्धिमानी की और अपना कोट दूसरी मंजिल से मेरी ओर फेंका जिसे बड़ी तेजी से लपक कर मैंने उठाया और उस कोट से अपना ऐर बच्चे का चेहरा और हाथ ढके ।मैं तो हॉफ स्वेटर पहने था।फिर उसी पूर्व पोजीशन में ।इस तरह से बच्चे की जान बची नहीं तो एक कैंटीन वाला युवा उनके जमाने में बिजली से तत्काल जल गया था जब मैं बच्चों को लेकर कानपुर गया था और दूसरा यह अनर्थ हो जाता ।उसी के कुछ दिन बाद मिश्रिख में थाने और तहसील के पास. त्यागी बाबा पर मधुमक्खियाँ टूट पड़ीं ,वह चिल्लाते रहे सभी तमाशबीन बने रहे ,मेरे एक साले साहब भी वहाँ थे किन्तु कोई भी उनकी कुछ भी सहायता न कर सका ।परिणामततः वह उसी दिन मोक्षदा एकादशी को वहीं हनुमानमन्दिर के प्रांगणमें महाप्रयाण कर गए।हमारे बहुत ही शुभ चिन्तक थे ।अब लोगों ने उनकी संगमरमर की मूर्ति बनवाकर मन्दिर बनवाकर स्थापित करवा दी है ।
 तो,कहने का मतलब यह है कि उन कुछ मधुमक्खियों के दंश को झेलने के लिए मु़झे कितने इंजेक्शन लगवाने पड़े ।लंबा इलाज किया ,भगवत्कृपा से ठीक हो गया क्योंकि -

“परहित बस जिनके मव माहीं ।
तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।”
बल्कि परहित और स्वधर्म पालन में यदि प्राण भी चले जाएँ तो भी श्रेयस्कर है –
“परहित लागि तजइ जो देही।
संतत संत प्रसंसत तेही।।”
अस्तु,जब कीड़े मकोड़ों के दंश को नहीं झेला जा सकता तो फिर हम शंकर जी से अपनी क्या तुलना करें,केवल अपवी गलत आदतों को जस्टीफाई करने के लिए कुतर्क के अलावा और क्या है?
बलराम जी तो स्वयं शेषावतार थे ,उनकी गाथा लिखने से विषयायाम वृद्धिमान् हो जाएगा ।यदुवंशियों का अनुकरण करें तो परिणाम सबके सामने है 56 कोटि सर्वसमर्थों का तत्काल विनाश जिन्हे विद्यार्थी जीवन में पढ़ाने वाले शिक्षक 80लाख ब्राह्मण नियुक्त थे (हरिवंश पुराण के अनुसार)फिर उनको आदर्श माने वाला उनके सामने कहाँ टिकता है,यह वह स्वमूल्यांकन स्वयं करे ।साथ में क्या वह विनाश से बच पाएगा ।नाश ही नहीं विनाश शब्द का मैं प्रयोग कर रहा हूँ जिसे हम अन्यत्र अपने लेखों में स्पष्ट कर चुके हैं।
निष्कर्ष यह कि हमें हर हालत में मदपान से बचना चाहिए फिर वह चाहे जिस चीज का लौकिक नशा हो,नशा तो नशा ही है जो सदा ही विनाशकारी है ।वारुणी,सोमरस,बलराम,यदुवंशी,शंकर जी ……आदि से तुलना करना आत्मघातीसिद्ध होगा ।ईश्वर सदा बचाए हम सबको अनर्थ से ।विषय लंबा हो गया है और रात भी अधिक हो गई है ,अतः इस विषय को हम यहीं विराम देते हैं । ‘नशा छोड़ो,ईश्वर से नाता जोड़ो।।’

नशा छोड़ने के कारगर उपाय—

वैसे तो मैं समापन कर रहा था किन्तु मर्ज की व्याख्या के साथ उसके उपचार को बताए बिना,कीरण के साथ निवारण बिना लेख उतना लोकोपयोगी न होगा।
“कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कर हित होई।।”(श्रीरा.च.मा.)
“सर्वलोकानुरञ्जनी।”( सागरनन्दीकृत ‘नाटकलक्षण रत्नकोश’ की कारिका संख्या 07)
(1) चिकित्सा विज्ञान केअनुसार नशेड़ी जब नशा छोड़ देता है ,तब सल्फर की कमी हो जाने से उसे बेचैनी होती है ।अतः अदरक
( “आर्द्रात् जायते शुण्ठिः”)
को ठीक तरह से धुलकर साफ करके छोटे-छोटे टुकड़े काट ले और फिर उन पर सेंधा नमक छिड़क दे ,फिर उसे छाया में सुखाकर किसी काँच के बर्तन में सुरक्षित रख दे ।बस हो गई दवा तैय्यार।जब भी नशेबाज को नशे की तलब लगे तब वह उसमें से एक टुकड़ा मुह में डाल ले तो नशा छूट सकता है ।
(2) ऊपर की देशी आयुर्वैदिक औषधि की जगह होमियोपैथी की सल्फर-30 भी दी जा सकती है।
(3) “सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।”
दैवी कृपा पाने के लिए किसी रविवार के दिन एक सीलबन्द शराब (जिसका वह ज्यादा शौकीन है)की बोतल खरीदिए और किसी भैरो जी के मन्दिर में जाकर आधी बोतल भैरों बाबा को अर्पित करके अपनी अर्जी लगा दीजिए ,फिर शेष बची आधी बोतल को रोगी के पूरे शरीर पर क्लॉक वाइज सात बार वार कर किसी चौराहे पर रखकर चले आवें किन्तु ध्यान रहे कि घूमकर पीछे न देखें ।घर आकर हाथ-पैर–मुह धोकर परमात्मा. को याद करें तो नशा छोड़ने में दैवीय अनुग्रह अवश्य प्राप्त होती है ।
उपाय तो और भी बहुतेरे हैं किन्तु अब हमारे पास समय नहीं है ,अतः इत्यलम्।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।

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