Monday, August 8, 2022
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दांत की सड़न हो सकती है जानलेवा-डॉ .शालू

Dr.Shaloo

दांत में सड़न की समस्या को हल्के में लेना भूल है। कारण, इलाज में देरी से दांत की नसों का इंफेक्शन जबड़े की हड्डियों में फैल जाता है। इसमें पनपा मवाद किसी भी वक्त श्वसन नलिका (टै्रकिया) में फंसकर जानलेवा हो सकता है।मुख एव दंत रोग विशेषज्ञ डॉ . शालू ने बताया की देश में दांतों में कैविटी की समस्या आम है। इसमें पायरिया, दांतों में कीड़े व नसों में संक्रमण प्रमुख है। वहीं दांत की नसों में संक्रमण को नजरंदाज करना भारी पड़ सकता है। इससे लुडविंग एंजाइना बीमारी का खतरा है।

दिल पर भारी पायरिया

मुख एव दंत रोग विशेषज्ञ डॉ . शालू के अनुसार मसूड़ों की बीमारी पेरियोडॉटाइटिस दिल की बीमारी पर भारी है। कारण, पायरिया के बैक्टीरिया से ब्लड में पनपने वाले फैक्टर दिल की सेहत के लिए खतरा बन जाते हैं। इससे हार्ट अटैक की समस्या बढ़ जाती है।

गाइडेड सर्जरी से जीरो रिस्क

गाइडेड सर्जरी पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि विजुअल ट्रीटमेंट प्लानिंग से कंवेंशनल इंप्लांट में बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। बताया कि यह एक हाई एंड सर्जरी है। इससे एक्सीडेंट में फ्रैक्चर हुए जबड़े को भी सुधार कर दांत फिक्स किए जा सकते हैं। इस विधि में पहले कंप्यूटर पर टाइटेनियम व प्लास्टिक सीट बनाकर पेशेंट के जबड़े का स्ट्रक्चर बना लेते हैं। वहीं इसी पर इंप्लांट फिक्स कर प्लानिंग तैयार कर लेते हैं। इसी के आधार पर मरीज में बगैर कोई इधर-उधर छेड़छाड़ के इंप्लांट फिक्स कर देते हैं। यह जीरो रिस्क सर्जरी है।

क्षतिग्रस्त जबड़े में बोन ग्रॉफ्टिंग मददगार

बुजुर्ग अवस्था, जबड़े में सड़न या फ्रैक्चर होने पर बोन ग्रॉफ्टिंग कर इंप्लांट फिक्स किए जा सकते हैं। इसमें मरीज की पसली की हड्डी या कूल्हे के पास की हड्डी ली जाती है। वहीं डोनेट प्रिजर्व में बॉडी की हड्डी को भी प्रोसेसिंग कर लगाया जा सकता है। इन हड्डियों को जबड़े के अनुसार ढाल कर मुंह के अंदर फिट कर देते हैं। ऐसे में व्यक्ति में इंप्लांट व दांत फिक्स करना आसान हो जाता है।

दांतों को निकालने से बचें

दांतों के काले पड़ने या उसमें खाना फंसने पर डॉक्टर उन्हें निकाल देते हैं, जो गलत है। दांतों को बचाने के लिए कीड़ा साफ कर फिलिंग करनी चाहिए। वहीं दांतों की नसों तक सड़न होने पर उसका रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना चाहिए।

‘पीआरएफ’ डेड दांत को करता जिंदा

बच्चों में चोट लगने पर दोबारा दांत पूरे नहीं निकलते हैं। इसका कारण दांतों व ब्लड वेसल्स का डेड हो जाना है। ऐसे में संबंधित बच्चे का खून लेकर सेंटी फ्यूगल मशीन में डालते हैं। 12 मिनट में मशीन में खून का पीआरएफ बन जाता है। इसे संबंधित दांत के पास रूट कैनाल ओपेन कर इंजेक्ट कर देते हैं। लिहाजा, दांत के पास मृत सेल डेवलप होने लगते हैं और अधूरा दांत पूरा बन जाता है।

दांत टूटने पर जल्द लगवाएं

अक्सर लोग दांत टूटने पर लगवाने में देर करते हैं। वहीं कुछ तो सभी गिरने पर ही लगवाते हैं। उनका भ्रम होता है कि सभी दांत गिरने के बाद बनवाने पर डेंचर बेहतर बनेगा। मगर यह भ्रम है। उन्होंने बताया कि दांत लगवाने में देर करने पर जबड़े का टीएमजी हिस्सा डिस्टर्ब हो जाता है। इससे कंधे, सिर में दर्द व चेहरे में भी विकृति का खतरा रहता है, जबकि खाना सही से न चबा पाने से पाचन तंत्र संबंधी दिक्कतें होने लगती है। वहीं डॉ. शहीम ने इंप्लांट बेस्ड डेंचर लगाने के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि इससे मरीज में सस्ती दर पर बत्तीसी लग सकती है।

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