Monday, January 17, 2022
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आज है गोपाष्टमी, गाय बछड़ों की पूजा करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं

Gopashtami 2020 : गाय की रक्षा एवं पूजन करने वालों पर सदैव श्रीविष्णु की कृपा बनी रहती है।
गाय की रक्षा एवं पूजन करने वालों पर सदैव श्रीविष्णु की कृपा बनी रहती है।

गाय बछड़ों की पूजा का पावन त्योहार गोपाष्टमी इस साल 22 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। गोपाष्टमी पर्व यानि गायों की रक्षा, संवर्धन एवं उनकी सेवा के संकल्प का ऐसा महापर्व जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि को पोषण प्रदान करने वाली गाय माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु गाय-बछड़ों का पूजन किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने जिस दिन से गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी का दिन था। इसी दिन से गोपाष्टमी पर्व का प्रारम्भ हुआ।

श्री कृष्ण ऐसे बने गोविन्द
श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार श्री कृष्ण जब पांच वर्ष के हो गए और छठे वर्ष में प्रवेश किया तो एक दिन यशोदा माता से बाल कृष्ण ने कहा-मइया! अब मैं बड़ा हो गया हूँ। अब मुझे गोपाल बनने की इच्छा है मैं गोपाल बनूं? मैं गायों की सेवा करूं? मैं गायों की सेवा करने के लिए ही यहां आया हूं। यशोदाजी समझाती हैं कि बेटा शुभ मुहूर्त में मैं तुम्हें गोपाल बनाउंगी। बातें हो ही रहीं थी कि उसी समय शाण्डिल्य ऋषि वहां आए और भगवान कृष्ण की जन्मपत्री देखकर कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गौचारण का मुहूर्त निकाला।
बाल कृष्ण खुश होकर अपनी माता के ह्रदय से लग गए। झटपट माता यशोदा जी ने अपने कान्हा का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियां पहनाने लगीं तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे मैया यदि मेरी गायें जूती नहीं पहनतीं तो मैं कैसे पहन सकता हूं और वे नंगे पैर ही अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ गायों को चराने वृन्दावन जाने लगे। अपने चरणों से वृन्दावन की रज को अत्यंत पावन करते हुएआगे-आगे गौएं और उनके पीछे -पीछे बांसुरी बजाते हुए श्याम सुन्दर तदंतर बलराम, ग्वालबाल तालवन में गौचारण लीला करने लगे।

भगवान कृष्ण का अतिप्रिय ‘गोविन्द’ नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पड़ा था क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गायों और ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर रखा था। आठवें दिन इंद्र अपना अहम त्यागकर भगवान कृष्ण की शरण में आए,। उसके बाद इंद्र की कामधेनू गाय ने भगवान का अभिषेक किया और इंद्र ने भगवान को गोविंद कहकर सम्बोधित किया।
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गौ की पूजा करें, पुण्य कमाएं
गोपाष्टमी के दिन प्रातःकाल में ही गायों को स्नान आदि कराया जाता है और गऊ माता को मेहंदी, हल्दी, रोली के थापे लगाए जाते हैं। इस दिन बछड़े सहित गाय की पूजा करने का विधान है। धूप, दीप, गंध, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड़, वस्त्र आदि से गायों का पूजन किया जाता है और आरती उतारी जाती है। इसके बाद गायों को गो-ग्रास दिया जाता हैं। पौराणिक मान्यता है कि गाय की परिक्रमा करके गायों के साथ कुछ दूरी तक चलना भी चाहिए। ऐसा कर उनकी चरण रज को माथे पर लगाने से सुख- सौभाग्य में वृद्धि होती है। गाय की रक्षा एवं पूजन करने वालों पर सदैव श्रीविष्णु की कृपा बनी रहती है। तीर्थों में स्नान-दान करने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, व्रत-उपवास और जप-तप व हवन-यज्ञ करने से जो पुण्य मिलता है वहीं पुण्य गौ को चारा या हरी घास खिलाने अथवा किसी भी रूप में गाय की सेवा करने से प्राप्त हो जाता है।

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