जीवन में नैतिक शक्ति का जो मूल्य है, उसका सम्मान किया जाना चाहिए

विवाह से पहले जब गांधारी को पता चला कि उनके होने वाले पति दृष्टिहीन हैं, तो उन्होंने अपनी आंखों पर स्वयं पट्टी बांध ली। गांधारी ने जीवन भर आंखों को ढके रखा। क्या जबरदस्त नैतिक शक्ति थी उनमें.

मंजू लता शुक्ला

विवाह से पहले जब गांधारी को पता चला कि उनके होने वाले पति दृष्टिहीन हैं, तो उन्होंने अपनी आंखों पर स्वयं पट्टी बांध ली। गांधारी ने जीवन भर आंखों को ढके रखा। क्या जबरदस्त नैतिक शक्ति थी उनमें! विवाहोपरांत उन्होंने केवल दो बार आंखों से पट्टी हटाई। एक बार पति धृतराष्ट्र के आदेश पर और दूसरी बार भगवान श्रीकृष्ण को देखने के लिए। 
कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पूरा क्षेत्र एक विशाल श्मशान भूमि बन गया था। गांधारी की सभी बहुएं विधवा हो चुकी थीं और वे अपने-अपने पति के शव के पास करुण विलाप कर रही थीं, तब गांधारी भी वहां मौजूद थीं। पांडव, अपनी माता कुंती और भगवान श्रीकृष्ण के साथ वहां आए, क्योंकि उनके पक्ष के भी कई लोग मारे गए थे और उन्हें उनके रिश्तेदारों को सांत्वना देनी थी।

श्रीकृष्ण ने गांधारी को धैर्य बंधाते हुए कहा, विलाप क्यों माते? यह तो सृष्टि की रीत है। आपको भी एक दिन जाना है। फिर यह अधीरता क्यों? दुख में डूबी गांधारी ने कहा- कृष्ण, आप मुझे सांत्वना दे रहे? आपको यह बात शोभा नहीं देती। कृष्ण ने पूछा, क्यों माता? गांधारी ने उत्तर दिया, यदि आपने योजना न बनाई होती, तो मेरे सभी पुत्र मारे न जाते।
शोकाकुल गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया, जैसे मेरे कुल का मेरी आंखों के सामने अंत हुआ, वैसे ही आपकी आंखों के सामने आपका भी हो। भगवान ने उस शाप को स्वीकार किया। उन्होंने उस शाप को स्वीकार न किया होता, तो ऐसा नहीं होता, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया, क्योंकि वह दुनिया को दिखाना चाहते थे कि जीवन में नैतिक शक्ति का जो मूल्य है, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। 

(लेखक धार्मिक मामलो की जानकार एवं रष्ट्रीय विचारक है )