Monday, January 17, 2022
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काबुल की दुर्दशा का कारण अमेरिका का पलायन नहीं अफगानी सेना का अपने दीन के प्रति समर्पण है

काबुल की सड़कों पर बर्बरता का नंगा नाच हो रहा है। भारत अफगानिस्तान में अपनी पूंजी लगाकर जो चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाया था उस पर तालिबानी आतंकवादी राइफल लहराते हुए अपनी गाड़ियां दौड़ा रहे हैं।
अफगानिस्तान में होने वाला घटनाक्रम शायद एक बहुत बड़ा नाटक है दूसरे देश मे refugee भेजने का। ये जो लोग दिख रहे हैं क्या ये शरिया को मानने वाले लोग नही है। इनमें और तालिबान में अंतर क्या है। तालिबान में Aliens थोड़े है अफगानी ही है 90% अफगान वहां की सेना, ऑफिसर डॉक्टर सब तालिबान को support करते हैं इसलिए अमरीका back हो गया। भारत के लोग क्यो इतना उछल रहे समझ नही आ रहा। भारत का देवबंद क्या है वह भी तो तालिबान है। उसको खत्म कर अपनी पीढ़ियों की चिंता करो अफगान की चिंता करते हम केवल एक जोकर नजर आ रहे हैं। we are sitting on demographic time bomb

अरुण कुमार सिंह (सम्पादक)
अमेरिका और नाटो की दस हजार की सेना कुछ हजार तालिबानों को गुफा में छुपने के लिए मजबूर कर दी थी, लेकिन क्या कारण है कि साढ़े तीन लाख की अफगानी सेना उन्हें नहीं रोक पायी? वास्तविकता तो यह है कि अफगानी सेना नें युद्ध ही नहीं लड़ा। बीस वर्षों से अमेरिका के पैसे पर पल रहे और प्रशिक्षित किए जा रहे सैनिक इन बर्बर असभ्यों से भला कैसे हार गए? वास्तविकता तो यह है कि वे हारे नहीं बल्कि स्वयं एक-एक राज्य सौंपते गए और अंत में काबुल भी सौंप दिए, क्योंकि यह उनके दीन की बात थी।
 भले ही वे अमेरिका से वेतन ले रहे थे लेकिन उनका ईमान तालिबानियों के साथ था। अमेरिका यह जान चुका था कि ओसामा और मुल्ला उमर के मारे जाने के बाद अफगानिस्तान में उसका अपना काम तो पूरा हो चुका है। अब वह ऐसे लोगों का बोझ ढो रहा है जो स्वयं तालिबान से लड़ने की इच्छा शक्ति नहीं रखते,बल्कि अपने मजहबी फरमान के आधार पर उनके प्रति सहानुभूति भी रखते हैं 

बीस वर्ष एक लम्बा समय होता है। कब तक कोई देश दूसरे का बोझ उठाएगा? वह भी उस परिस्थिति में जब सभी प्रयास मजहब के सामने राख में घी सुखाने की तरह बेकार हों।
अहमद शाह दुर्रानी :इस व्यक्ति ने कल्पना की थी अफगानिस्तान की सत्रहवी सदी के अंत मे, उसके पहले उसे “आर्याना” बोलते थे बल्कि ये नाम अभी चंद बरस पहले समाप्त हुआ है ! अफगानिस्तान की सबसे बड़ी होटल चैन थी AARYANA और इसी नाम से अफगानिस्तान की पहली एयरलाइन्स भी थी।

महर्षि पाणिनी यहीं के रहने वाले थे और गुरू गोरखनाथ की शिक्षा यहीं से प्रारंभ हुई थी।

बहरहाल बहरकैफ़

ईश्वर की लाठी में आवाज नही होती है ! आज भी गजनी मे शिलालेख है, जिस पर लिखा है

” दुख्तरे हिंदुस्तान नीलामे 2 दीनार “

वर्षो पहले जिस अफगानिस्तान मे गजनी के सौजन्य से भारत की हिन्दू बेटियां दो- दो दीनार में नीलाम की गई थीं।
समय का पहिया घूमते ही,आज उसी क्षेत्र के उन्हीं अफगानों की बेटियां बिना कोई मोल भाव के सरेआम लूटी जा रही हैं !!
वो लुटेरे भी कोई गैर मुल्की नहीं बल्कि उनके अपने मजहबी ईमान वाले ही मुल्क प्रेमी हैं !!

सवाल यह उठता है कि फिलिस्तीन पर छाती पीटने वाले बिल्कुल पड़ोस के इस घटनाक्रम पर अब चुप क्यों हैं ???

बाकी उधर काबुल मे मुगलिया सल्तनत का न्यूड डांस चल रहा है चार माइकों वाले बिल्डिंगो से सरकारी कर्मचारियों के लिए ऐलान हो रहा है ” خپله ځوانه لور او ښځه موږ ته وسپارئ” (अपनी जवान बेटी और पत्नी को हमारे हवाले कर दो)।

ये वही अफगानिस्तान है जहां कभी बुद्ध के शांति पाठ चलते थे….

ये वही अफगानिस्तान है जो कभी “आर्यावर्त” का हिस्सा था तो तब दया और धर्म की बाते होती थी….

ये वही कंधार (गंधार प्रदेश) है जहा की लड़किया भारत के कुरू वंश मे आकर ब्याही गयी थीं….

इतिहास उठा कर देख लो जो जो मुल्क मजहब के नाम पर “सनातन” से विमुख हुए उनका हाल क्या है कैसा है….

अब आप ये सोचिए जो अपने हममजहबियो को साथ ऐसा सलूक कर सकते हैं उनने हमारे और आप के पूर्वजों के साथ कैसा हकूक सलूक किया होगा।

आज आप भारत मे हैं और तब तक सुरक्शित हैं जब तक अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। उधर फैज की एक रचना याद आ गयी

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी….

पता नही था की ये उसने अफगानिस्तान के लिए लिखा था।

और दूसरी बात यह भी तय है की तुम काफिरों का तब तक कुछ बिगाड़ नही पाओगे जब तक वो अपनी काफीरियत पर कायम हैं…… तब तक लड़ते रहो अपने में, और दुनिया से तेल भी खत्म होने वाला है।

वास्तव में यह अमेरिका का पलायन नहीं मजहब की मूलगामी सोच का प्रतिफल है। जो सरकारें और जो लोग इससे सबक नहीं लेंगे उन्हें भी भविष्य में ऐसे ही परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिये।

जय श्रीराम 🚩

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