Thursday, September 29, 2022
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बुढ़िया बता! किसकी लाश है तू?……..

ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक लाश मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने लाश से बार बार पूछा- “लाश! कौन हो तुम?”

   लाश का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्दे लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी लाश थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।

    किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से लाश को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- “ऐसी नौकरी तो साली दुश्मन को भी न मिले…”

     पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक लाश से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।

      इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब लाश बोलने लायक हुई। लाश जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो लाश सुगबुगाई। पुलिस को बल मिला, इंस्पेक्टर ने पूछा- “बुढ़िया बता! किसकी लाश है तू?”

 लाश बोली- “वीणा दास को जानते हो दारोगा साहब?”

“कौन वीणा दास? मैं नहीं जानता किसी वीणा वीणा को…”

“पद्मश्री वीणा दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री वीणा दास। वही वीणा, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। जिसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।”

“हैं?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना…” इंस्पेक्टर झुंझला गया था।

संघ में सभी छात्राओं को लाठी, तलवार चलाने के साथ-साथ साइकिल और गाड़ी चलाना भी सिखाया जाता था। इस संघ में शामिल कई छात्राओं ने अपना घर भी छोड़ दिया था और ‘पुण्याश्रम’ में रहने लगीं, जिसका संचालन बीना की माँ सरला देवी करती थीं। हालांकि, यह छात्रावास बहुत सी क्रांतिकारी गतिविधियों का गढ़ भी था। यहाँ के भंडार घर में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए हथियार, बम आदि छिपाए जाते थे।

बताया जाता है कि कमला दास ने ही बीना को रिवोल्वर लाकर दी थी। साथ ही वे टिन के बक्सों में बाकी क्रांतिकारियों के लिए बम आदि भी लाती थीं।

कलकत्ता के ‘बेथ्युन कॉलेज’ में पढ़ते हुए 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के समय बीना ने अपनी कक्षा की कुछ अन्य छात्राओं के साथ अपने कॉलेज के फाटक पर धरना दिया। वे स्वयं सेवक के रूप में कांग्रेस अधिवेशन में भी सम्मिलित हुईं। इसके बाद वे ‘युगांतर’ दल के क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आईं। उन दिनों क्रांतिकारियों का एक काम बड़े अंग्रेज़ अधिकारियों को गोली का निशाना बनाकर यह दिखाना था कि भारतीय उनसे कितनी नफ़रत करते हैं।

    लाश ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- “कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये…”

    “अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में…” सब एक साथ चीखे।

    लाश हँसी। बोली, ” सुनो! वीणा के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।”

     सबकी निगाह लाश पर जम गई थी। वह बोलती गयी, “कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में उसके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।

     विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर उठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए…”

    सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, ” उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी…”

    “फिर?”

    “फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो वीणा ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि अब सुखी जीवन जीने के दिन हैं… पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! वीणा ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।”

      “फिर?”

      “फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया… और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी… वहीं से निकल ली।”

      “ओह… हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?”

      ” हाँ जी! पर दुखी मत होवो आपलोग! जब मैं दुखी नहीं तो तुमलोग क्यों हो रहे हो? मुझे मेरा देश बहुत प्रिय है। मैं यहाँ मर कर भी बहुत प्रसन्न हूँ।”

      “लेकिन सरकार को तो आपकी व्यवस्था करनी चाहिये थी। इतनी बुरी मृत्यु… उफ्फ!”

      “सरकार तो सरकार ही होती है जी, वह अंग्रेजों की हो या भारतीयों की हो… कुछ नहीं बदलता! जिसे देश की जनता भूल जाय उसे सरकारें क्या याद रखेंगी।”

       भीड़ छंटने लगी। सब अपने अपने काम में लगे। लाश भी जला दी गयी। पर इंस्पेक्टर के साथ कुछ गड़बड़ हो गया। वह जब भी अपने कार्यालय में टंगा भारत का नक्शा देखता तो उसे उसमें लाश की तस्वीर दिखती, और तब उसकी आँखों में केवल लज्जा होती थी।

(लेखक रसायनशास्त्र में परास्नातक,धार्मिक मामलो के जानकार एवं राष्ट्रीय विचारक है )

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