Wednesday, July 6, 2022
spot_img

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष :ध्यान से मिलती है मोक्ष की सिद्धि

भारतमें प्राचीन काल से ही जैन परम्परा ने योग एवं ध्यान के विषय में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज तक के उपलब्ध साहित्य, परम्परा और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव योग विद्या के आदि प्रवर्तक माने जाते हैं- उसहो जोगो उत्तं, पढमो करीअ आसणतवझाणं। लहीअ सुद्धाप्पं य, अप्पा मे संवरो जोगो।।

मंजू लता शुक्ला

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने सर्वप्रथम योग विद्या का उपदेश दिया। उन्होंने सर्वप्रथम आसन, तप, ध्यान किया और शुद्ध आत्मा को प्राप्त किया और उपदेश दिया कि आत्मा ही संवर और योग है।

जैन आगम ग्रंथों के अनुसार, इस युग के वे प्रथम योगी तथा योग के प्रथम उपदेशक थे। उन्होंने सांसारिक (भौतिक) वासनाओं से व्याकुल, धन-सत्ता और शक्ति की प्रतिस्पर्धा में अकुलाते अपने पुत्रों को सर्वप्रथम ज्ञान पूर्ण समाधि का मार्ग बताया, जिसे आज की भाषा में योग मार्ग कह सकते हैं। श्रीमद्भागवत में प्रथम योगीश्वर के रूप में भगवान् ऋषभदेव का स्मरण किया गया है। वहां बताया है कि भगवान् ऋषभदेव स्वयं विविध प्रकार की योग साधनाओं का प्रयोगों द्वारा आचरण करते थे। नानायोगश्चर्याचरणे भगवान् कैवल्यपतिऋषभ:

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने सर्वप्रथम योग विद्या का उपदेश दिया। उन्होंने सर्वप्रथम आसन, तप, ध्यान किया और शुद्ध आत्मा को प्राप्त किया और उपदेश दिया कि आत्मा ही संवर और योग है।

प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने जनता को सुखी होने के लिए योग करना सिखाया। मोहन जोदड़ो और हड़प्पा में जिन योगी जिन की प्रतिमा प्राप्त हुई है, उनकी पहचान ऋषभदेव के रूप में की गई है। मुहरों पर कायोत्सर्ग मुद्रा में योगी का चित्र प्राप्त हुआ है। यह कायोत्सर्ग की मुद्रा जैन योग की प्रमुख विशेषता है। आज तक प्राचीन से प्राचीन और नई से नई जितनी भी जैन प्रतिमाएं मिलती हैं, वे योगी मुद्रा में ही मिलती हैं। वीतराग मुद्रा के तीन मुख्य आसन हैं- पद्मासन, खड्गासन और कायोत्सर्गासन। पूरक, कुम्भक और रेचन- ये तीन प्रमुख प्राणायाम हैं। ये सभी शरीर द्वारा किए जाने वाले तप हैं।

अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर ने भी ऋषभ देव की योग साधना पद्धति को आगे बढ़ाते हुए सघन साधना की। प्रथम शताब्दी में अध्यात्म योग विद्या के प्रतिष्ठापक आचार्य कुन्दकुन्द दक्षिण भारत के एक महान योगी थे। उन्होंने प्राकृत भाषा में एक सूत्र दिया ‘आदा मे संवरो जोगो।’अर्थात यह आत्मा ही संवर है और योग है। जैन तत्त्व विद्या में जो संवर तत्त्व है, वही आज की योग शब्दावली का द्योतक है। जैन योग के दो प्रमुख सूत्र हैं- संवरयोग और तपोयोग। तप को पुष्ट करने और उसमें गहराई लाने के लिए बारह भावनाओं का विधान है, इसलिए भावना योग भी जैन योग का एक प्रमुख अंग है।

जैन योग का लक्ष्य आत्मानुभूति है। जिनागम का सार यही है कि आत्मा आत्मा में रमे, यही परम ध्यान है और ‘ध्यान से मोक्ष की सिद्धि होती है।’- ऐसा जिनवर ऋषभदेव के द्वारा निर्दिष्ट किया गया है।

(लेखक रसायन शास्त्र में परास्नातक की छात्रा एवं धार्मिक मामलो की जानकार है)

Related Articles

Stay Connected

0FansLike
3,385FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles