Monday, January 17, 2022
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कुछ याद उन्हे भी कर लो:अग्निपथ के हुतात्मा “हेमू कालानी” उम्र केवल 19 वर्ष


जल्लाद ने फांसी का फंदा उसके गले में डालते हुए उसके मुंह को कपड़े से ढकना चाहा तो युवक ने मुंह पर से कपड़ा हटा फंदे को पकड़ लिया “मैं ये हार अपने गले में खुद डालूंगा” और उसने मुस्कुराते हुए वैसा किया भी। इधर फिर एक बार “वन्दे मातरम्” नारा बुलंद हुआ उधर मजिस्ट्रेट के संकेत पर जल्लाद ने लीवर खींचा

हुतात्मा “हेमू कालानी”

21जनवरी 1943! प्रातः 6 बजे का समय। अविभाजित भारत के सिंध प्रांत की सक्खर सेंट्रल जेल। जेल में बड़े ओहदे के सरकारी अधिकारी जेल के अंदर बने फांसीघर में तैयारियों का जायजा ले रहे थे। तभी सिपाही “डेथ सेल” वाली बैरक से एक सजायाफ्ता कैदी एक ऐसे नौजवान को जिसने बस जवानी की दहलीज पर कदम रखा था को लेकर फांसीघर की तरफ चले।गोरा रंग, दुबला पतला शरीर, तेजस्वी चेहरा और गर्वीली चाल। सुबह की नीरवता को भंग करते हुए युवक “हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा”, “इंकलाब जिंदाबाद”, “भारत माता की जय” के नारे तेज आवाज में लगाते हुए गर्व से सीना ताने चला जा रहा था। फांसीघर मे कुछ मिनटों की औपचारिकताओं के बाद युवक से उसकी आखिरी इच्छा पूछी गई तो उसने भारतवर्ष में फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। युवक को फांसी के तख्ते पर खड़ा कर दिया गया।

पर जल्लाद ने फांसी का फंदा उसके गले में डालते हुए उसके मुंह को कपड़े से ढकना चाहा तो युवक ने मुंह पर से कपड़ा हटा फंदे को पकड़ लिया “मैं ये हार अपने गले में खुद डालूंगा” और उसने मुस्कुराते हुए वैसा किया भी। इधर फिर एक बार “वन्दे मातरम्” नारा बुलंद हुआ उधर मजिस्ट्रेट के संकेत पर जल्लाद ने लीवर खींचा और युवक का शरीर फांसी के फंदे पर झूल गया। युवक का नाम हेमू कालानी।उम्र केवल 19 वर्ष। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ने का दोषी।
11 मार्च 1924 को अविभाजित भारत के सिंध प्रांत के सक्खर जिले मे जन्मे हेमू कालानी के पिता पेरूमल कालानी और चाचा मंगाराम कालानी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय थे।मां जेठाभाई धार्मिक विचारों की आस्थावान महिला थी जिन्होंने बालक में सेवा एवं त्याग की भावना जगाई। पिता चाचा के दिये राष्ट्रीयता के संस्कारों के कारण हेमू बचपन से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में रुचि लेने लगे।इस कारण परिवार के लोग उसे लेकर कुछ चिंतित व भयभीत रहते थे और उसे गांधीवादी विचारधारा की ओर मोड़ने की कोशिश करते थे। मगर भगत सिंह की शहादत से प्रेरित हेमू के मन में बलिदान की प्रबल लहरें जोर मार रही थी। “मां मैं भी भगत सिंह की तरह फांसी पर चढ़ भारत माता को आजाद कराऊंगा”।हेमू की बात मां हंसकर टाल देती पर मैट्रिक मे आते आते हेमू के मन का सपना वास्तविकता में बदल चुका था।अब तक हेमू स्वराज सेना गठित कर उसके झंडे तले सैकड़ों साथी छात्रों को अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए तैयार कर चुका था। 

“भारत छोड़ो” आंदोलन अपने चरम पर था।चारों ओर विद्रोह के स्वर सुनाई पड़ रहे थे।सिंध मे विद्रोहियों ने प्रशासन के पैर उखाड़ दिये थे इसलिए पूरे सिंध मे मार्शल ला लागू करके प्रशासन सेना को सौप दिया गया था।आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए अतिरिक्त ब्रिटिश सैनिकों मांग की जा चुकी थी।इसी बीच एक दिन हेमू कालाणी को गुप्त जानकारी मिली कि आजादी के लिए प्रयासरत आन्दोलनकारियों को कुचलने और उनका दमन करने के लिए रोहड़ी से अंग्रेज सैनिकों से भरी एक विशेष फौजी रेलगाड़ी सक्खर से होकर बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा जाएगी। यह सुनकर हेमू व उनके साथियों ने निश्चय किया कि किसी भी हालत मे हथियारों से भरी ट्रेन को अंग्रेजों तक नहीं पहुंचने देना है।

तत्काल पटरी उखाड़ कर ट्रेन को पलटने की योजना तैयार की गई और 23 अक्तूबर 1942 की रात योजना को अंजाम देने के लिये हेमू अपने विश्वस्त साथियों के साथ अंधेरे में रेल पटरी को अस्त व्यस्त करने जा पहुँचे। फिश प्लेटे खोलकर स्लीपर हटाकर पटरियो को उखाड़ने के लिये हथौड़े के जोरदार प्रहार किये जा रहे थे। फौलादी पटरियों पर हथौड़े के प्रहार की तेज आवाज चारो ओर गूँज रही थी तभी गश्त करते सिपाहियों का ध्यान सन्नाटे से आती तेज आवाज की ओर गया।पुलिस कर्मियों की नजर उनपर पड़ी और उन्होंने हेमू कालाणी को उनके दो साथियों के साथ गिरफ्तार करके मार्शल ला अधिकारियों को सौप दिया। मार्शल ला अधिकारी ने हेमू कालानी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उनके दो साथियों को रिहा कर दिया।मार्शल ला के तहत दी गई इस सजा की पुष्टि के लिये केस सेना के एरिया प्रमुख कर्नल रिचर्डसन के सामने पेश किया गया जिसने आजीवन कारावास की सजा की संपुष्टि करने के बजाय इसे बढाकर मृत्युदंड (फांसी) मे बदल दिया।

छोटे से बालक को मृत्युदंड दिये जाने के समाचार से पूरे देश मे शोक और तनाव की लहर सी दौड गई। सिंध के गणमान्य लोगों ने कर्नल रिचर्डसन से मिलकर फांसी की सजा को आजीवन कारावास की सजा मे बदलने की मांग की लेकिन उसने ऐसा करने से इंकार कर दिया।अंत मे वायसराय लार्ड वेवल के पास क्षमादान की अपील भेजी गई।वायसराय द्वारा क्षमायाचना अस्वीकार करने के बाद २१ जनवरी १९४३ को हेमू कालानी को सक्खर सेन्ट्रल जेल में फांसी दे दी गई।

लेखिका अंजलि सिंह राजपूत

……लेखिका टाइम्स ऑफ़ इंडिया (अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र)में संवाददाता है!

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