Thursday, January 27, 2022
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गणेश शंकर विद्यार्थी निर्वाण दिवस ! पंडित_गणेश शंकर विद्यार्थी कौन..?क्रांतिकारी लेखक या धर्म विरोधी…..? जानिए अवश्य


पंडित शंकर विद्यार्थी वो व्यक्ति थें जिनके नाम में #पंडित तो है जिनका जन्म भी श्रीवास्तव परिवार में हुआ पर अफसोस इन्हें बचपन से ही #धर्म विरोधी कीड़ो ने जोड़ से काटा…और इसका कारण यह है कि इनकी शिक्षा संस्कृत हिंदी से नही बल्कि उर्दू से प्रारम्भ हुई……वैसे थें तो श्रीवास्तव परिवार से ही परन्तु सेक्युलरता का कीड़ा काटने की वजह से गणेश शंकर श्रीवास्तव से गणेश शंकर विद्यार्थी बने….इनकी मानसिकता से किसी को भी यही बोध होगा कि इन्हें ब्राह्मण होना अभिशाप प्रतीत होता,वो तो रक्त संस्कार था कि इन्होंने अपने नाम से गणेश औशंकर हटाकर रहीम और सलीम नही रख लिया,कही कहा गया कि ये ईश्वरवादी थे कही लिखा गया कि ये अव्वल दर्जे के धर्म विरोधी थें…इन्हें मजहब से प्रेम था या नही ये सिद्ध तो नही हुआ पर ये हिन्दुराष्ट्र के सख्त खिलाफ थें इनका मानना था कि हिन्दू राष्ट्र एक अंधराष्ट्रवाद की कल्पना है।वो इस बात का प्रचार-प्रसार इस तरीके से लोगो में करते थें जैसे हनुमान का राम के प्रति प्रेम पर सन्देह होने में हनुमान जी सीना चीड़ कर दिखला दिया करते थे….यही तक नही इन्होंने धर्म के नाम पर बंटबारा होने से पहले एलान कर दिया कि भविष्य में कोई भी देश हिंदू राष्ट्र नही हो सकता और बात भी इनकी सही निकली,मजहब वतन तो बन गया पर हिंदू राष्ट्र आज तक नही बना,जिन्हीने और भी कहा कि हिन्दू धर्म की मानसिकता रखने बाले भय बड़ी गलती कर रहें है…हिन्दू धर्म के धर्माचार्य ही यहां के सबकुछ नही होंगे ये सरासर गलत है,मतलब सब मिलाकर यही की ये पूर्ण रूप से सलमा के भाई थें…ये बात यहीं खत्म नही होती ..

इन्होंने मजहब पर तंज कसा…वो तंज कितना बढ़िया था आईये देखते हैं…उन्होंने कहा कि{ ऐसे लोग जो टर्की, काबुल, मक्का या जेद्दा का सपना देखते हैं, वे भी इसी तरह की भूल कर रहे हैं. ये जगह उनकी जन्मभूमि नहीं है.’ उन्होंने आगे ऐसे लोगों को अपने देश की महत्ता समझाते हुए कहा है, ‘इसमें कुछ भी कटुता नहीं समझी जानी चाहिए, यदि कहा जाए कि उनकी कब्रें इसी देश में बनेंगी और अगर वे लायक होंगे तो उनके मरसिये भी इसी देश में गाए जाएंगे.’ }अब समझ में आया आपको अब चलिए एक उदाहरण देता हूँ जो उनकी मन में भरी हिन्दू धर्म के लिए विष का पूर्ण रूप से बोध करा देगी… आप सब 1947 बाले  राष्ट्रपिल्ला मोतरमा गन्दी को जानते होंगे जी हाँ ये उसका अनन्य भक्त था…संकोचित न होइए ये सिर्फ हिन्दूधर्म व ईश्वरवाद के खिलाफ थें,भक्तिवाद के नही। हाँ तो राष्ट्र पिल्ला मोतरमा गन्दी देश को बर्बाद करने में जिस शब्द को हथियार बनाया उस  ‘”अहिंसा परमो धर्म””वाक्य में प्रयुक्त धर्म को हटाकर नीति कर दिया क्योंकि उसे वहां धर्म शब्द पढ़कर अपनाने में चुभन होती थी…. इनका कहना था कि धर्माचार्य धर्म के आड़ में    उन्माद फैलाते हैं…यही तक नही इन्होंने धर्म के खिलाफ़ लिखने में कोई कसर नही छोड़ी…और इसके लिए इन्होंने एक लेख लिखा जिसका नाम था,”धर्म की आड़” यह लेख आज भी इन्हें धर्म विरोधी साबित करने को काफी हैं…

वो अपने लेख में लिखते हैं की ‘देश में धर्म की धूम है और इसके नाम पर उत्पात किए जा रहे हैं  और आगे कहते हैं कि ऐसे अंधभक्त कुछ समझते बुझते नही है बस धर्माचार्य जिधर जोत देते हैं ये उधर जुत जाते हैं….अबतक आप समझ ही गए होंगे मजहबी प्रचारक गणेशशंकर विद्यार्थी ताउम्र अपनी लेखनी के जरिए लोगों को धार्मिक उन्माद के प्रति सावधान करते रहे. लोगों को धर्म के खिलाफ किखकर भड़काते रहें आओसे लेखक थे हमारे विद्यार्थी जी .. अब अतः मे एक मजे की बात जान लीजिए..इन घोर सेक्यूलर महोदय की मृत्यु इनके घर कानपुर में 25 मार्च को हिंदू मुस्लिम दंगे में एक मुस्लीम के हाथों मार देने पर हुई थी ……..कुल मिलाकर क्या समझे आप भले ही खुद का अस्तित्व भूलकर  मोजाबी बन जाईये पर मोजाबी आपके नाम में लगे गणेश रमेश सुरेश को नही भूलेंगे और आपको हिंदू मानकर अंत में बोटी-बोटी कर डालेंगे…..गीदड़ की मौत मरने से अच्छा है की किसी का सड़ा हुआ मौजा सूंघ कर मर जाए….इसीलिए वीर पुत्रों आप उठो और अपनी लेखनी धर्म विरुद्ध नही बल्कि धर्म पताका लहराने के लिये उठाओ और यदि कोई लेखनी व कोई शस्त्र हमारे धर्म आचरण के खिलाफ उठे तो पूरा का पूरा खंजर सीने में उतार डालो और अंत मे यही कुछ पंक्तियां लिखना चाहूंगा कि-
छोड़ो अब अपने कलमो में नीली स्याही को भरना,छोड़ो अब जात पात पर उत्साही होकर लड़ना।भू भाग पर दिख रहा धर्म अपना अँधियारो में,आखिर आयी ताकत कहाँ से इन रंगे सियारों में।उठो धर्म रक्षक भैरव काली का करो रक्त श्रृंगार,धर से सर को अलग करो लेकर हाथों में हथियार।।शस्त्रमेव् जयते

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