Monday, August 8, 2022
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सुनें और गुनें का अभ्यास ही हमारे जीवन को सार्थकता प्रदान करता है

भारतीय चिंतनधारा में वेदों को श्रुति कहा गया है। हजारों साल से पाठविधि द्वारा चारों वेदों को ऋषियों और पंडितों ने सुरक्षित रखा था। कहीं कोई भूल न हो, इसके लिए अत्यंत वैज्ञानिक विधि से जटापाठ, घनपाठ आदि पाठ विधियों के जरिये उसे इतना सुरक्षित किया गया कि वेद संसार के सबसेप्रामाणिक ग्रंथ बने, जिनमें कोई भी अंश प्रक्षिप्त नहीं है।

मंजू लता शुक्ला

मैक्समूलर ने इसी आधार पर वेदों का प्रकाशन किया और इसी कारण उन्हें मोक्षमूलर की संज्ञा दी गई। आज भी सातवलेकर द्वारा संपादित वेदों का भाष्य अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि कान की आकृति गर्भस्थ शिशु के स्वरूप के समान होती है। बाहरी विश्व को हमारे भीतर के विश्व से जोड़ने का मानो वह प्रवेश द्वार है। सदियों से यह बात दुहराई गई है कि हम शतायु हों, सौ साल जिएं, सौ शरद देखें और सुनें। वास्तव में, दूसरों को जानने के लिए देखने के साथ सुनना भी जरूरी है। 

हमारी यह दुनिया नादमयी है। स्वरों का यह गुंजार ही इसे जीवंत रखता है। जहां भी नजर दौड़ाइए, एक स्वर एक संगीत अदृश्य भाव से गूंजता मिलेगा। वास्तव में, किसी बात को सुनना, अच्छा श्रोता होना, व्यक्ति के धैर्य और अनुशासन का द्योतक है। बाहर का नाद और हमारा अंतर्नाद जब एक बिंदु पर मिलते हैं, तब वे हमें महासमाधि की ओर ले जाते हैं। शब्द में अशब्द गढ़ देने का गुण होता है। जब हम कोई बांसुरी सुनते हैं, तो उसका आनंद उठाने के लिए ध्यानस्थ होना पड़ता है। जीवन का रस दौड़ते-भागते नहीं लिया जा सकता। स्थिरता ही हमें अच्छा श्रोता बनाती है, ध्यान की एकाग्रता सिखाती है। \

कई लोग प्रवचन सुनते समय भी शांत नहीं हो पाते। उनका मन प्रश्नों के कुंडलित घेरे में उलझा रहता है। कोई ज्ञानी आचार्य जब तक कुछ कह रहा है, तब तक उनका मन किसी प्रतिपक्षी की तरह नए-नए प्रश्न उठाने को आतुर रहता है। शायद इसीलिए भारतीय विचारकों ने कहा, सही श्रोता और सही वक्ता का मेल जल्दी नहीं हो पाता। श्रोता ग्राहक है, ‘रिसेप्टिव’ है, उसे हर शब्द को पीना और पचाना पड़ता है।

हमारी यह प्रकृति स्वरों का कोष है। झरने, नदियां, समुद्र, आकाश में छाई घन-घटाएं और उनमें चमकती विद्युत लताएं, ये सभी प्रकृति के जीवित होने के प्रमाण हैं। इन्हीं ताल-सुरों पर प्रकृति तरंगित और स्पंदित हो रही है, केवल उसे ध्यानपूर्वक देखने और सुनने की आवश्यकता है। हम एकाग्र होकर देखें, तो लपलपाती हुई अग्नि की चटक ध्वनि, जल का प्रवाह, वायु की गति और गंधवती पृथ्वी का स्फोट संगीतमय लगता है। आकाश का तो गुण ही शब्द माना गया है। अत: सुनें और गुनें का अभ्यास ही हमारे जीवन को सार्थकता प्रदान कर सकता है।  

(लेखक रसायनशास्त्र में परास्नातक,धार्मिक मामलो के जानकार एवं राष्ट्रीय विचारक है )

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