Monday, January 17, 2022
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वामपन्थी साहित्यकार प्रेमचंद एव उनका समाज ..पुण्यतिथि विशेष

सम्पादक अरुण कुमार सिंह

जो व्यक्ति जीवन भर ठाकुरों का विरोध करता रहा, वह अपने घर में ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान एवं कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की पुत्री को ही प्रथम पुत्रवधू बनाकर लाया।

जीवन भर ब्राह्मणों एवं ब्राह्मण धर्म को कोसने का कार्य करनेवाले प्रेमचन्द के परिवार में आज संसार की ऐसी कौन-सी जाति है, जिस जाति की लड़की इनके घर में न आयी हो और इनके घर की लड़की उस जाति में न गयी हो। 

प्रेमचंद अपनी जगह लेकिन बाकी सब साहित्यकारों का योगदान भूल दिया गया, जैसे वो कभी पैदा ही नहीं हुए साहित्य में उनका कोई योगदान नही है उनका कोई जन्मदिवस नही कोई निर्वाण दिवस नही ? हिंदी साहित्य में हमारे कई पसंदीदा कथाकार रहे जैसे “सुदर्शन: उनकी कहानी ,” हार की जीत ” आज तक नही भूल पाता मनोविज्ञान और नैतिकता की कितनी गहरी समझ की कहानी है लेकिन ….………..सच तो यह है कि प्रेमचन्द अपने समय के प्रथम श्रेणी के क़िस्सागो थे। उनका यह रूप उनके जीवन में भी दृष्टिगत होता है। उन्होंने जिस ठाकुर के कुएँ का चित्रण किया है, वह मुझे पूरे पूर्वांचल में कहीं भी दिखायी नहीं पड़ता।

गोदान में वे जिस ज़मींदारी का विरोध करते हैं, उसी ज़मींदारी के वे स्वयं इच्छुक थे, किन्तु उन्हें इस बात का अन्दाज़ा हो गया था कि अब यहाँ से अंग्रेज़ जानेवाले हैं और ज़मींदारी का अन्त होनेवाला है, इसलिए उन्होंने ज़मींदार बनने का विचार अन्ततः त्याग दिया था। जो व्यक्ति जीवन भर ठाकुरों का विरोध करता रहा, वह अपने घर में ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान एवं कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की पुत्री को ही प्रथम पुत्रवधू बनाकर लाया। जीवन भर ब्राह्मणों एवं ब्राह्मण धर्म को कोसने का कार्य करनेवाले प्रेमचन्द के परिवार में आज संसार की ऐसी कौन-सी जाति है, जिस जाति की लड़की इनके घर में न आयी हो और इनके घर की लड़की उस जाति में न गयी हो। 

वामपन्थी लेखक प्रेमचन्द के जिस चमरौधे जूते के हाईलाईट करते हैं, उन्हें शायद यह ज्ञात नहीं है कि उस समय महाराज बनारस भी गाँव के चमार का बनाया हुआ ही जूता पहनते थे। हाँ! उसमें क़ीमती रत्न अलग से जड़ दिये जाते थे। उस समय तक किसी ब्रॉण्डेड कम्पनी के जूते नहीं आते थे। प्रेमचन्द अपने गाँव लमही से पैदल या बैलगाड़ी से बनारस जाते थे, यह भी उनकी ग़रीबी का द्योतक नहीं है; क्योंकि उस समय तक अत्याधुनिक वाहन उपलब्ध ही नहीं थे।

कल्पना कीजिए कि जिस व्यक्ति को उसके पिता अध्ययनकाल में पढ़ाई के लिए खर्च किये जानेवाले धन के अतिरिक्त अलग से प्रतिमाह जेब़ खर्च देते रहे हों, वह ग़रीब कैसे हो सकता है? जो प्रति सप्ताह सिनेमा देखने जाता रहा हो, वह ग़रीब कैसे हो सकता है? जो दो दो विवाह करता है, वह ग़रीब कैसे हो सकता? जिसके घर में चोरी होने पर चोरों को अच्छी खासी रकम मिलती हो, वह ग़रीब कैसे हो सकता है? जो स्वयं अपना प्रेस चलाता रहा हो, वह ग़रीब कैसे हो सकता है? उन्होंने ग़रीबी का नाटक केवल अपने आपको स्थापित करने के लिए किया था। पूर्वांचल में ऐसे लोगों के लिए ही ‘कम्बल ओढ़ के घी पीना’ वाली कहावत कही गयी है।आज समाज में जो वर्गभेद विद्यमान है, उसके मूल में प्रेमचन्द की मनगढ़न्त कहानियाँ ही हैं।
“प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए, गरीबी में जिन्दा रहे और गरीबी में ही मर गये। यह सर्वथा तथ्यों के विपरीत है।”
कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:-

1.  उनका पहला वेतन 20 रुपये मासिक था वर्ष 1900 में जब 4-5 रुपये में लोग परिवार चलाते थे। उन्होंने लिखा है कि यह वेतन उनकी कल्पना की ऊँची से ऊँची उडान में भी नहीं था।

2. प्रेमचंद ने फरवरी, 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था। तब उनका वेतन था 150 रुपये मासिक। उस समय सोना लगभग 20 रुपये तोला (लगभग 11.5 ग्राम) था। आप सोचें आज की मुद्रा में कितना रुपया हुआ ?

3. प्रेमचंद ने अपनी एकमात्र पुत्री कमलादेवी के विवाह में ( 1929 में) लगभग सात हजार रूपये खर्च किये थे। इसकी जानकारी मुझे स्वयं कमलादेवी ने दी थी।

4. वर्ष 1929 के आसपास लमही गाँव में प्रेमचंद ने 6-7 हजार रुपये लगाकर मकान बनवाया था।

5. ‘माधुरी’ पत्रिका के सम्पादक बने तो वेतन था 150 रुपये मासिक।

6. बम्बई की फिल्म कम्पनी में नौकरी की वर्ष 1934-35 में तब वेतन था 800 रुपये मासिक। लौटने पर बेटी के लिए हीरे की लौंग लेकर आये थे। आज की धनराशि में 800 रुपये लगभग 6-7 लाख के बराबर है।

7. प्रेमचंद के पास दो बीमा पालिसी थीं। उस समय यह बहुत बडी बात थी।

8. प्रेमचंद ने वर्ष 1936 में रेडियो दिल्ली से दो कहानियों का पाठ किया और उन्हें 100 रुपये पारिश्रमिक मिला। आज उस समय के 100 रुपये लगभग एक लाख के बराबर होंगे।

9. प्रेमचंद की मृत्यु के 14 दिन पहले उनके दो बैंक खातों में लगभग 4500 रुपये थे।
ये सारे तथ्य उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर हैं। उनकी जीवनी से इन तथ्यों को गायब करने का क्या औचित्य था ? प्रगतिशील लेखकों को इससे बडा आघात लगा और वे आज तक मुझे गालियाँ दे रहे हैं पर वे यह नहीं कहते कि ये तथ्य झूठे हैं। वे इन्हें सत्य मानते हैं लेकिन उद्घाटन करने पर गालियाँ देते हैं। इसे ही वे वैज्ञानिक आलोचना कहते हैं । उनकी तकलीफ यह है कि उनकी झूठी स्थापनाओं की कलई खुल गयी है।
31 जुलाई 18808 अक्तूबर 1936मुंशी प्रेमचंद जी की कालजयी कहानी का अंश
जब वंशीधर पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं, तो उनके अनुभवी पिता सीख देते हैं-“नौकरी में औहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूंढना, जहाँ कुछ ऊपरी आय हो मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त होजाती है। ऊपरी आय बहता हुआ स्तोत है, जिससे सदैव प्यास बुझती है।”
(क्या सन1936 से पहले भी भारत का आदमी घूस लेता था फिर तो इस देश का भगवान ही मालिक हैं।)
श्रधांजलि

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