Wednesday, July 6, 2022
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रामायण महिलाओं का सम्मान करना सिखाती है- इंद्रेश कुमार

RSS: दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में गुरुवार को एक बुक लॉचिंग का कार्यक्रम रखा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार मौजूद रहे।

आरएसएस राष्ट्रिय कार्यकारिणी सदस्य डॉ इंद्रेश कुमार जी
गोलोक बिहारी राय राष्ट्रिय संगठन महामंत्री राष्ट्रिय सुरक्षा जागरण मंच

 दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में गुरुवार को एक बुक लॉचिंग का कार्यक्रम रखा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS) के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार मौजूद रहे। कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान इंद्रेश कुमार ने देश में हो रही सांप्रदायिक हिंसाओं पर अपनी बात रखी।

किसी धर्म को गाली देना गलत-RSS नेता इंद्रेश कुमार

इंद्रेश कुमार ने नूपुर शर्मा के बयान के बाद हुए बवाल पर अपनी राय रखते हुए कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां किसी नेता को धर्म के खिलाफ बोलने पर पार्टी से निकाल दिया जाता है, दुनिया में ऐसा कोई देश है क्या जहां ये होता हो? आज से पहले भारत में भी ऐसी घटना देखने को नहीं मिली है। नूपुर और नवीन के कुछ गलत बयान के चलते पार्टी नें उन्हें बाहर निकाल दिया।

लेकिन औवेसी पर कौन कार्रवाई करेगा। पीएफआइ के नेता कुछ गलत कहें तो उन पर कार्रवाई कौन करेगा। उन्होंने आगे कहा हम सभी को दूसरे धर्म का सम्मान करना चाहिए।

9 जून को जेएनयू में हुए पुस्तक विमोचन के मौके पर नूपुर शर्मा की टिप्पणी पर RSS के सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा किसी भी धर्म को गाली देना मानवता नहीं, पार्टी ने उन पर कदम उठाया है।

रामायण महिलाओं का सम्मान करना सिखाती है- इंद्रेश कुमार

उन्होंने रामायण का जिक्र किया। उन्होंने कहा रामायण पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है। पूरी दुनिया में गुड गवर्नेंस का एकमात्र उदाहरण राम राज है। RSS के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने कहा कि रामायण लूटो और लूट कर ले जाओ, इस जीवन पद्धति को नहीं सिखाती। रामायण कहती है, महिलाओं को सम्मान करो। राम किसी के लिए खतरा नहीं थे। रामायण एक जाति विहीन इतिहास है। राम के चरित्र को मिलाकर भारत देश बना है। उन्होंने आगे कहा, Follow your own, don’t criticize others

बता दें कि जेएनयू में ”हिमालय- हिंद महासागर राष्ट्र समूह: रिवाइटलाइजिंग द कल्चर एंड मैरिटाइम ट्रेड रिलेशंस” पुस्तक का विमोचन किया। इस मौके पर कई और बड़े लोग भी शामिल हुए थे।

भारत की लचीलापन की शक्ति : नई वैश्विक व्यवस्था की चुनौतियाँ”

हिमालय हिंद महासागर राष्ट्र-समूह: रिवाइटलाइजिंग द कल्चरल एंड मैरिटाइम ट्रेड रिलेशंस जून 9, 2022 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में आयोजित किया गया। पुस्तक का विमोचन डॉ इंद्रेश कुमार जी (राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य, आरएसएस), महामहिम डॉ अशरफ शिखालियाव (भारत में अजरबैजान गणराज्य के राजदूत), महामहिम लुकमान बोबोकलोंजोडा (भारत में ताजिकिस्तान गणराज्य के राजदूत), महामहिम श्री फरीद ममुंदजाय (भारत में अफगानिस्तान के इस्लामी गणराज्य के राजदूत), महामहिम श्री अखतोव दिलशाद (भारत में उज्बेकिस्तान के राजदूत), महामहिम डॉ. एहसानुल्ला शकरोलाही (फारसी अनुसंधान केंद्र, ईरान कल्चर हाउस के निदेशक), महामहिम डॉ. मुमिन चेन (भारत में ताइपे आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र (टीईसीसी) के उप प्रतिनिधि), माननीय ग्यारी डोलमा (गृह मंत्री केंद्रीय तिब्बती प्रशासन, धर्मशाला), प्रो. शाहिद अख्तर, (सदस्य, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग, भारत सरकार), प्रो. सचिन गुप्ता (माननीय कुलपति, संस्कृति विश्वविद्यालय, मथुरा), श्री तालो मुगली (अध्यक्ष – वन निगम, अरुणाचल प्रदेश सरकार), श्री गोलोक बिहारी राय, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) आरएन सिंह जी, प्रो. मजहर आसिफ, प्रो. महताब आलम रिजवी, श्री रजनीश त्यागी, के द्वारा किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रो. शांतिश्री धूलिपुडी पंडित, (माननीय कुलपति, जेएनयू, नई दिल्ली) की संक्षिप्त उपस्थिति भी थी।  

कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. मजहर आशिफ के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने पुस्तक का परिचय दिया और श्री इंद्रेश कुमार जी द्वारा पुस्तक के विचार की कल्पना करने के तरीके पर भी प्रकाश डाला। प्रो. आसिफ ने जेएनयू की अकादमिक परंपरा के बारे में भी बात की, जो हमेशा से  विमर्श और चर्चा की भावना का समर्थन करता है।

स्वागत भाषण के बाद श्री गोलोक बिहारी राय जी  ने अपने विचार साझा की। उन्होंने हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र के सांस्कृतिक और समुद्री व्यापार महत्व पर ध्यान केंद्रित किया। हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह, जिसमें 54 देश और दुनिया की कुल आबादी का लगभग 40% हिस्सा शामिल है। उनके अनुसार यह नीति- सिद्धांत हिंसा, भौतिकता और सैन्यीकरण व विस्तरवाद या व्यापार और वाणिज्य के वर्चस्व के आधार पर नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों पर बनाई गई थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि व्यापारी सांस्कृतिक राजदूत हुआ करते थे जिन्होंने विभिन्न राष्ट्रों के साथ सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए। हिंद-महासागर के अंतर्गत आने वाले विभिन्न राष्ट्रों के महत्व पर जोड़ देते हुए उन्होंने कहा, सांकेतिक रूप से  उस राष्ट्र में कभी भी सूरज नहीं डूबता था, जिसका हिंद महासागर पर नियंत्रण होता था, क्योंकि यह समृद्धि का प्रतीक था। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कालांतर में, हिंद-महासागर की सांस्कृतिक एकता को कमजोर करने के लिए औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा कई बार इसका नाम बदला गया। उन्होंने कहा कि यह विचार निकट भविष्य में अपनी महत्वत को जरूर प्राप्त करेगा।

डॉ. अशरफ ने पुस्तक के संपादकों और योगदानकर्ताओं को बधाई दी। उन्होंने अजरबैजान और भारत के बीच संबंधों का संक्षिप्त विवरण दिया। उन्होंने कहा कि अज़रबैजान में भारतीय संस्कृति और ज्ञान को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने दोनों देशों द्वारा की गई कुछ पहलों और विकासों पर भी चर्चा की।

श्री फरीद ममुंडजेय ने अपने संबोधन में अफगान छात्रों और विद्वानों को शैक्षिक सहायता प्रदान करने में जे.एन.यू की भूमिका  और महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पुरानी परंपरा पर भी प्रकाश डाला जिसे दोनों देश साझा करते हैं। महाभारत से जम्बूद्वीप  का उदाहरण लेते हुए उन्होंने भारत के समुद्री महत्व के बारे में एक संक्षिप्त विवर भी दिया। उनके अनुसार, भारत की दुनिया में एक जरूरी और महत्वपूर्ण समुद्री उपस्थिति है। उन्होंने एक उल्लेखनीय बात कही कि 21वीं सदी में वैश्विक चुनौतियों के लिए वैश्विक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।

डॉ एहसानुल्ला शकरोल्लाही ने अपने संक्षिप्त संबोधन में समुद्री संस्कृति और व्यापार के लंबे इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने ईरान और भारत के सांस्कृतिक संबंधों पर भी रोशनी डाली। उन्होंने विलियम ड्यूरेंट के विचार को उद्धृत किया कि भारत “सभ्यता का पालना” था, जिसके कारण भी हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह   का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने किताब की प्रशंसा करते हुए कहा कहा कि इस  पुस्तक की ख्याति बहुत जल्द ईरान तक पहुंच जाएगी।

श्रीमती ग्यारी डोल्मा ने वर्तमान वैश्विक मंच में भारत की स्थिति के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां आपसी सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में, उन्होंने कहा कि, भारत वह हाथ है जिसे हम जिसे हम  भरोसे के साथ थाम सकते हैं और मानव जाति के उद्धार के लिए साथ आगे बढ़ सकते हैं।

इसके बाद माननीय  इंद्रेश कुमार जी  का मुख्य भाषण हुआ।उन्होंने श्रोताओं को हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह के महत्व और वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति में इसके महत्व के बारे में बताया। उन्होंने दुनिया भर के उदाहरणों का हवाला देते हुए दुनिया में संघर्ष और हिंसा के कारणों का विस्तृत विवरण दिया। उनके अनुसार, कुछ लोगों के निहित स्वार्थों के कारण दुनिया का 40% हिस्सा लगातार संघर्ष में है। उन्होंने कहा कि स्थिति की विडंबना यह है कि हर कोई शांति की बात करता है लेकिन वे लगातार संघर्ष में हैं। उन्होंने अध्यात्म की भूमि के रूप में हिमालय और भारत के आध्यात्मिक महत्व के बारे में भी बताया। वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसे विश्व-गुरु (एक ऐसा देश जिसमें दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है) के रूप में माना जाता है। उनके अनुसार विश्व-गुरु के रूप में किसी अन्य देश को इतनी व्यापक स्वीकृति नहीं मिली है। हिंद-महासागर के महत्व के बारे में भी बताया और कहा कि यह समृद्धि का प्रतीक है। उन्होंने श्रोताओं से हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह की अवधारणा पर विचार करने और वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति में इसकी भूमिका के बारे में सोचने के लिए भी कहा। 

उन्होंने कहा, हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र  समूह (एच.एच.आर.एस.) में अफ्रीका और एशिया के 54 देश शामिल हैं। जब कोई उन्हें ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखता है, तो सबसे पहली बात जो लोगों के दिमाग में आती है, वह यह है कि ये देश हजारों वर्षों से मैत्रीपूर्ण और सांस्कृतिक संबंध साझा करते आया है। इसके कुछ प्रमाण इन देशों के ज्ञात इतिहास और मौखिक जनश्रुतियों के   इतिहास/कहानियों में मिलते हैं।उदाहरण के तौर रामायण पर  जोड़ देते हुए उन्होंने भारत और श्रीलंका की साझा संस्कृति और स्मृति  का वर्णन किया। उन्होंने कहा इसलिए, हिमालय-हिंद महासागर राष्ट्र समूह वामपंथी और कुछ पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा विकसित यूरो-केंद्रित इतिहास का खंडन करता है।  हिमालय-हिंद महासागर समूह का सिद्धांत, इन राष्ट्रों के इतिहास पर प्रकाश डालता है, जो लाखों वर्षों से चला आ रहा है। इसी तरह, ये राष्ट्र भी महाभारत इतिहास और, राम और कृष्ण के चरित्र का उनकी लोक/सांस्कृतिक स्मृति में विशेष स्थान  प्रदान करता है। एच.एच.आर.एस. की अवधारणा मुख्य रूप से इन देशों के बीच इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य ‘बिना संघर्ष, बिना अपराध के एक दुनिया का विकास करना है। इसका उद्देश्य इन देशों के बीच आपसी सम्मान और सामूहिक समर्थन प्रणाली विकसित करना और वसुधैव कुटुम्बकम  का सपना साकार करना है। उन्होंने इस पहल पर विचार-विमर्श करने के लिए FANS को बधाई दी।

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