Monday, January 17, 2022
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गोलक बिहारी राय की बेहतरीन कविता ..अपनों से विध्वंस नहीं…हर समझोता दंश नहीं

कुछ कह पातीं
तो बात बनती
मिट्टी में सनी हुई
अंगुलियाँ कुम्हार की
क्या बनाना था।

बहरी थी
सुन नहीं पायी
टींस पेट की
देखी नहीं झुर्रियां चेहरे की
भूख मिटाने के हित
चलती रहीं निरंतर
चाक की गति के अनुरूप
कलाकृतियों का खजाना था।

जीवन भर का भार
उठाने की दमखम
जो मन में रखता है
वह क्यों लड़ें जहाँ अपने
देखे कितने सुंदर सपने
क्यों टूटे होकर गुमसुम।

अपनों से विध्वंस नहीं
हर समझोता दंश नहीं
जलें ! पर ना इतना
अपने भी ही जायें ओझल
कुछ शेष बचे
मन सूर्य किरण
आज नहीं तो कल बदलेगा
हर क्षण रखता अपना दम।

(लेखक राष्ट्रिय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रिय महासचिव है)

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