Monday, January 17, 2022
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फेसबुक, ट्विटर, गूगल सबको भारत की डिजिटल संप्रभुता का सम्मान करना ही पड़ेगा – रविशंकर प्रसाद

भारत में इन दिनों लोगों के मन में इस बात को लेकर फिक्र है कि कहीं व्हॉट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बन्द तो नहीं हो जाएंगे? व्हाट्सएप के 53 करोड़ यूजर्स को लगता है कि कहीं ये ग़ायब तो नहीं हो जाएगा? फेसबुक यूज करने वाले 41 करोड़ लोग सोच रहे हैं कि नई गाइडलाइन्स की वजह से ये भारत में बंद तो नहीं हो जाएगा? भारत में ट्विटर का इस्तेमाल सिर्फ पौने दो करोड लोग करते हैं, उन्हें डर है कि ट्विटर की सरकार के साथ तकरार चल रही है, इसके कारण कहीं ट्विटर का बोरिया बिस्तर गोल तो नहीं हो जाएगा?

उक्त बाते क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने एक टीवी शो के साक्षात्कार के दौरान कही

असल में तीन महीने पहले व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया के बाकी सारे प्लेटफॉर्म्स को, जिनमें गूगल भी शामिल है,  गाइडलाइल्स जारी की गई थी। 25 मई तक सारी सोशल मीडिया कंपनियों को अपने यहां ऐसे नोडल ऑफीसर्स अप्वाइंट करने थे, जिनके पास लोग शिकायत कर सकें, उन्हें ऐसे लोग नियुक्त करने थे जो जवाबदेह हों। इन सभी को चीफ कॉम्पलायंस अफसर, नोडल कॉन्टेक्ट पर्सन और रेजीडेंट ग्रिवांस अफसर नियुक्त करने हैं।

ये सभी अफसर  जनता से शिकायत मिलने पर 15 दिन में उसका निवारण करने के लिए बाध्य होंगे। पब्लिक की शिकायतों के लिए सैल्फ रेगुलेशन भी लागू करना था। शुक्रवार को गूगल, व्हॉट्सएप और फेसबुक इस बात पर  तैयार हो गए कि वे नए IT Regulations का पालन करेगं, लेकिन ट्विटर ने कहा कि वह एक वकील को बाहरी कंसलटेंट के तौर पर नियुक्त करेगा, लेकिन सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। अब तक Linked in, Telegram, Google, WhatsApp और Facebook ने IT मंत्रालय को अपने chief compliance officer, nodal contact person और grievance officer के नाम भेज दिये हैं। अभी Twitter अपने कड़े रुख पर कायम है और उसने सरकार पर आरोप लगाया कि वह बोलने की आज़ादी को छीनने की कोशिश कर रही है। रवि शंकर प्रसाद ने दो-टूक शब्दों में कहा कि ट्विचर इधर उधर की बात न करे, भारतीय कानून का पालन करे। उन्होने साफ कहा कि भारत की डिजिटल संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा।

रवि शंकर प्रसाद ने कहा, अगर कोई विदेशी कंपनी हमारे देश में कारोबार करेगी, पैसा कमाएगी, तो उसे भारत का कानून मानना होगा। उन्होने सवाल किया कि क्या ट्विटर,फेसबुक या गूगल के अफसर बुलाने पर अमेरिका की सीनेट के सामने पेश नहीं होते? क्या ये कंपनियां हाउस ऑफ कॉमन्स के सामने अपने प्रतिनिधि नहीं भेजती? जिन देशों में कारोबार करती हैं, उनके कानून मानती हैं, तो फिर भारत के कानून मानने में क्यों आनाकानी? ये दोहरा मापदंड क्यों? 

रवि शंकर प्रसाद ने ये भी सवाल किया कि जब फेसबुक और व्हाटसएप जैसी कंपनियां यूजर्स का डाटा एक दूसरे के साथ शेयर कर सकती हैं, तो फिर आपराधिक मामलों की जांच के लिए, क्रीमिनल केसेज़ के लिेए डेटा सरकारी एजेंसियों के साथ शेयर क्यों नहीं कर सकती? और सबसे बड़ी बात ये कि अगर सोशल मीडिया कंपनियां खुद को फैसिलिटेटर मानती हैं, अगर ये इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म हैं, तो फिर इन्हें कन्टेंट के साथ छेड़छाड़ करने का हक कैसे हो सकता है? कौन सही है, कौन गलत इसका फैसला करने का हक इन्हें कैसे हो सकता है?

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