Thursday, January 27, 2022
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चीन का 5th जनरेशन वारफेयर, और भारत के Sitting Ducks


भारत मे अधिकतर जनता Sitting Duck की category में आती है। जैसा कि शब्दो से लग रहा होगा, sitting duck का मतलब ‘बैठी हुई बतख’ नही होता……इसका अर्थ है, ‘आसान शिकार’, ‘मूर्ख’ या फिर ऐसा इंसान जिसे आने वाले खतरे से कोई सुरक्षा ना हो।
पिछले 5-7 सालों में चीन के साथ हमारे संबंध अच्छे नही रहे…बेशक हम बहुत बड़े Economic Partner रहे हों, लेकिन चीन अपनी हरकतों से बाज नही आता। उसका एक ही ध्येय है, कि येन केन प्रकारेण अपने पड़ोसियों को परेशान करना। वैसे भारत चीन का पड़ोसी नही है, हमारे बीच मे एक buffer state है, जिसे हम तिब्बत कहते हैं।
चीन के साथ हमारे clashes हुए हैं, doklam में, galvan में, लद्दाख में….और इसके अलावा अरुणाचल में उन्होंने कथित रूप से भारतीय सीमा में अंदर गांव बना लिये थे…..कोई कहता था कि 45 किलोमीटर अंदर आ गए, कोई 300 किलोमीटर बताता था….

Arun kumar singh(Editore)

.खैर ये दूरी is directly proportional to the quantity of weed they might have consumed.
चीन की आदत है इनफार्मेशन warfare चलाने की, जिसको हम 5th या 6th generation warfare भी बोल सकते हैं। इसको आप ये समझिए कि इसमे हथियार नही चलाने पड़ते…..इसमे दूसरा देश सीमा पर aggressive posture रखता है, वहीं आपके देश के मीडिया, Intellectuals, Retired Defence Personnels, विपक्षी पार्टियों की सहायता से आपके देश मे confusion की स्थिति पैदा करता है, जिससे आपके मन मे आप ही कि सरकार के खिलाफ अविश्वास पैदा हो जाये।
आप trend देखिए, हर हफ्ते 2 हफ्ते में आपको कुछ तस्वीरें, वीडियो या फिर आर्टिकल्स मिल जायेंगे…. जिसमे दिखाया जाता है कि चीन ने भारत की किसी इलाके पर कब्जा कर लिया, या economics को झटका दे दिया, या फिर कोई नया jet बना लिया जो भारत के jet से ज्यादा ताकतवर है…..और कुछ नही होता तो ये लोग भारत मे होती manufacturing पर सवाल उठा देंगे, वैक्सीन पर सवाल उठा देंगे…..और फिर इनके गुर्गे हैं ही ऐसी अफवाह को उड़ाने के लिए।
अब बात करते हैं हमारे प्यारे Sitting Ducks की
चीन कुछ भी छापता है, ये बतख type लोग फूफा सिंड्रोम से ग्रसित हो कर हल्ला मचाने लगाते हैं, बिना तथ्यों को जाने परखें। ये वो लोग होते हैं, जिन्होंने Google Maps पर भी Galwan, Doklam, या Pangong Tso की फिंगर नही देखी होंगी…..लेकिन ज्ञान इन्हें देना है, इन्हें फीता लेकर छाती नापनी है।
चीन ने एक नया वीडियो शेयर किया है, जिसमे उनके सैनिक Galwan valley में नदी के किनारे झंडा फहरा रहे हैं….ऐसा बताया जा रहा है कि ये वही इलाका है जहां 2020 में clashes हुए थे…..और इस वीडियो का ध्येय है भारतीयों को नीचा दिखाना, उन्हें ये अहसास कराना कि देखो हम तो इसी इलाके में हैं, ये हमारी ही territory है।
वीडियो आया, और जैसी उम्मीद थी…चीन का भारतीय ecosystem active हो गया और action लेने की बात करने लगा। वहीं हमारे Sitting Ducks लोग किकियाने लगे कि देखो चीन वालो ने galwan पर कब्जा कर लिया, कहां है 56 इंच की छाती।
अरे भैया, 56 इंच की छाती को छोड़ो, पहले अपने 56 ग्राम के दिमाग का इस्तेमाल करना सीखो।
Galwan एक घाटी है, इसका मतलब है कि दोनों तरफ पहाड़ हैं, और बीच मे है galwan नदी। अगर आप पहले MAP को देखेंगे तो पाएंगे कि galwan वैली के बीच से ही LAC भी गुजरती है, जो एक अघोषित सीमा है भारत और चीन के बीच। क्योंकि ये सीमा कभी भी सही से निर्धारित नही हुई, इसलिए कभी वो इस सीमा के इधर आ जाते हैं, कभी हम उधर चले जाते हैं।
रही बात चीन के वीडियो की, तो ये वीडियो Galwan नदी के दूसरी तरफ उस इलाके का है जिस पर चीन का कब्जा है…
अब आते हैं Pangong Lake पर….ये झील भी भारत का हिस्सा रही है हमेशा से। लेकिन 62 के युद्ध के बाद इसके लगभग 60% हिस्से पर चीन ने कब्जा कर लिया, और करीब 40% हमारे पास है….जो आधी अधूरी LAC बनाई गई है, वो इस झील के बीच से जाती है….इसलिये यहां भी dispute रहता है। 
जहां LAC है, वहां कुछ पहाड़ियां हैं, जिन्हें फिंगर कहते हैं, 1962 के बाद ये तय हुआ था कि किन पहाड़ियों तक हम patrolling करेंगे और किन फिंगर्स तक चीन की सेना patrolling करेगी……लेकिन जैसा कि कोई सीमा नही निर्धारित है, कोई बाउंडरी नही बनी, कोई तारबंदी नही की गई…..इसलिए इन जगह भी बवाल होता रहता है।
अब चलते हैं Doklam पर…..ये एक बड़ा पठारी इलाका है, जो चीन, भारत और भूटान के Tri-junction पर है। कोई इस इलाके को Doklam कहता है, कोई Doka La…. और चीन वाले इसे Donglang कहते हैं।
चीन ने भूटान के हिस्से के doklam पठार पर सड़क बनाने की कोशिश की, चूंकि भारत और भूटान का एक समझौता है, कि अगर भूटान पर कोई बाहरी ताकत हमला करेगी तो भारतीय सेना उसका जवाब देगी।
हमारी सेना ने समझौते का पालन किया और चीन के सामने खड़े हो गए। यहाँ ये बात समझने की है कि ये dispute हमारी जमीन पर नही, भूटान के इलाके में हो रहा था। भारत ने इसलिए एक्शन लिया था क्योंकि चीन अगर यहां कब्जा कर लेता तो उसकी पहुँच हमारे Siliguri कॉरिडोर और Chicken Neck तक हो जाती।
भारत की सेना मजबूती से खड़ी रही, सरकार ने पूरे साथ दिया, और अंततः चीन की सेना को ही पीछे हटना पड़ा।Doklam के मुद्दे पर मुझे आज तक समझ नही आया कि हमारी sitting ducks क्यों पागल हो जाती हैं, जबकि हमारी टेरिटरी में तो कुछ हुआ भी नही था।
अब आते हैं अरुणाचल प्रदेश पर, जहां कहां जाता है कि चीन ने 45 से लेकर 300 किलोमीटर घुस कर कोई गांव बना दिया है। दरअसल ये भी एक गलत प्रोपगंडा चलाया जाता है….सच्चाई क्या है वो जानते हैं।
1962 के युद्ध में चीन की सेना असम के तेजपुर तक घुस आयी थी। नेहरू जी ने तो एक शोक संदेश भी पढ़ दिया था असम के लोगो के लिए……20 नवम्बर 1962 को All India Radio पर नेहरू जी ने कहा था, कि My Heart goes out to the people of Assam.
बस इतना ही कह कर उन्होंने हाथ झाड़ लिए थे….अब पीछे वाले मरें, कटे, डूब जाएं….उनकी बला से।
1962 में अरुणाचल प्रदेश नाम का कोई राज्य नही था, आज के अरुणाचल प्रदेश को NEFA कहा जाता था, जिसका अर्थ था North East Frontier एजेंसी।
चीन ने 1962 में लद्दाख और NEFA में अंदर तक घुसपैठ कर ली थी, और एकाएक ceasefire किया गया, उसके बाद चीन की सेना वापस चली गयी…….लेकिन उन्होंने 2 हिस्सों पर कब्जा बरकरार रखा……एक अक्साई चिन और दूसरा NEFA का थोड़ा सा हिस्सा।
क्या नेहरू या उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने कभी चीन से बात करने की कोशिश की इस बारे में, कि भाई ceasefire करके जा रहे हो तो हमारे इलाको से तो निकलो। हम तो पाकिस्तान की जीते जिताये इलाके ताशकंत और शिमला समझौते में वापस लौटा कर आ गए थे……लेकिन क्या चीन के साथ ऐसा कोई engagement किया गया??? जवाब है ‘नही’
1962 के बाद चीन ने इन दोनों ही इलाको में सड़के बनाई हैं, सैन्य bases बनाये हैं, गांव बसाएं हैं….अपने troops deploy किये हैं, missile बैटरीज लगा रखी हैं…..और पता नही क्या क्या कर रखा है।
अब सवाल ये है कि इसका जिम्मेदार कौन है???
 क्या 1962 में हमारी हार की जिम्मेदारी आज की सरकार लेगी??
 जिन इलाकों पर चीन ने कब्जा किया, 
क्या उसकी जिम्मेदारी आज की सरकार लेगी??
हमारे Sitting Ducks को तो ये भी नही पता होगा कि जम्मू कश्मीर स्टेट का सबसे उत्तरी भाग का नाम Shaksgam valley है…..जो सियाचिन ग्लेशियर से उत्तर में पड़ता है, और गिलगित एवं अक्साई चिन के बीच है, जहां से काराकोरम हाईवे निकलता है…..ये वो जगह है जो 1963 में पाकिस्तान ने चीन को gift कर दी थी।
आज वहां चीन सड़क बनाये तो किसकी गलती है??? 56 इंच वाले की?
क्या अपने नेहरू, इंदिरा गांधी या उसके बाद वाली किसी भी सरकार को Sakshgaam वैली, Aksai चिन, NEFA के इलाकों को वापस लेने की कोई रूपरेखा बनाते देखा है?? अरे वो छोड़िए, क्या आपने हमारे Steel चिचा और Iron Lady के मुह से इन इलाकों के बारे में कोई स्टेटमेंट भी सुना है आजतक?? 
लेकिन आपको इन सबके लिए मोदी को दोष देना है 😊
अब आप पूछेंगे कि हमारे इलाके वापस क्यों नही लेता मोदी……सवाल वाजिब है…..
लेकिन हे मेरे प्यारे sitting ducks…. कब्जाए हुए इलाके मान मनौवल से नही मिलते…..जो युद्ध मे छीना गया था, वो सिर्फ युद्ध करने पर ही वापस आ सकता है।
और आप तो वो कौम हैं जो युद्ध नही झेल सकते…..युद्ध हुआ तो प्याज, टमाटर और पेट्रोल महंगा हो जाएगा…..है दम आपमे युद्ध को फंड करने का???
यार आपसे Information Warfare नही हैंडल होते….चीन कुछ भी चला देता है और आप नाचने लगते हो….ऐसे लोगे अपनी जमीन वापस???
पढ़ा करो, जानकारी बढ़ाया करो….information warfare का मतलब ही है जानकारी का युद्ध…..बिना जानकारी के आप सिर्फ एक sitting duck ही हैं, जिसके पास कोई protection नही, जिसे कोई भी बजा कर चला जाता है…..ऐसे लोग देश के लिए liability हैं और दुश्मन के लिए अघोषित asset।

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