Thursday, September 29, 2022
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हैदराबाद विलय’ के 75 साल: कैसे हुआ देश की सबसे बड़ी रियासत का भारत संघ में विलय?

जम्मू-कश्मीर का 26 अक्टूबर 1947 और जूनागढ़ का 20 फरवरी 1948 को भारत में विलय हो गया। लेकिन हैदराबाद रियासत के निजाम ने किसी भी कीमत पर भारत में विलय के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए खुद को स्वतंत्र रहने का एलान कर दिया था। आजाद भारत के लिए न तो भौगोलिक रूप से और न ही सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से यह संभव था कि हैदराबाद देश के बीचो-बीच एक नासूर की तरह बना रहे।

मंजू लता शुक्ला(नव्या )

सरदार पटेल ने हैदराबाद को ‘भारत के पेट में कैंसर’ कहा था और आखिरकार 17 सितंबर 1948 को ‘पुलिस एक्शन’ के तहत एक संघर्ष के बाद हैदराबाद का भारत में विलय करते हुए भारत के एकीकरण को पूरा कर राष्ट्र को स्थायित्व दिया। 

15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी तो मिली लेकिन छत-विछत रूप में। अंग्रेजों ने देश का बंटवारा तो कर ही दिया था साथ में 565 देशी रियासतों को हवा में लटकता छोड़ दिया। जिन्हें अंग्रेजों की कूटनीति के चलते भारतीय संघ में शामिल होने या न होने का अधिकार दे दिया गया था।  हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर और जूनागढ़ रियासतों ने अंग्रेजों के इसी चाल का फायदा उठाते हुए भारत में विलय नहीं कर स्वतंत्र रहने की बात कही। ऐसी प्रतिकूल स्थिति में राष्ट्र की एकता और अखंडता को हर तरह से खतरा था।

इस खतरे को देखते हुए ही आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तमाम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करते हुए न सिर्फ इन रियासतों का भारत संघ में विलय कर भारत को सुदृढ़ किया बल्कि उसे स्थायित्व भी प्रदान किया। आजाद भारत के एकीकरण की इस प्रक्रिया में सबसे आखिर में हैदराबाद रियासत का विलय हुआ। जो आजादी के एक साल बाद काफी संघर्ष के बाद संभव हुआ और तब कहीं जा कर भारत का एकीकरण पूर्ण हो पाया। 

अंग्रेज जब देश छोड़कर जा रहे थे तब देश में करीब 565 देशी रियासतें मौजूद थी। अंग्रेजों ने इन देशी रियासतों को यह छूट दे दी थी कि वे अपनी मर्जी के मुताबिक भारत या पाकिस्तान, किसी में भी मिल सकते हैं या चाहें तो स्वतंत्र रह सकते हैं। इसके लिए उन्होंने रियासतों को चालीस दिन का समय दिया था। पूरे राष्ट्र का इस तरह छोटे-बड़े खंडों में बंटे रहना आर्थिक-सामाजिक प्रगति में बहुत बड़ी बाधा थी। राजनीतिक शक्ति के मामले में भी एक रियासत दूसरी रियासत से क्षेत्रफल और जनसंख्या आदि में काफी अलग थी। ऐसे में भारत की एकता और अखंडता के लिए इन रियासतों का विलय करना बेहद जरूरी था। 

दरअसल, 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में तीन तरह के क्षेत्र थे। एक ब्रिटिश भारत का क्षेत्र जो सीधे गवर्नर जनरल के अधीन था। दूसरा फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र, जिनमें चंदननगर, पाण्डिचेरी और गोवा शामिल थे। और तीसरा देशी राज्य, जो सैकड़ों राजे-रजवाड़ों और स्थानीय शासकों के अधीन बंटा हुआ था। जिन्हें प्रिंस्ली स्टेट्स, रियासत, रजवाड़े, देशी रियासत आदि नामों से जाना जाता था। भारत के कुल क्षेत्रफल के 2/5 यानी 40 फीसदी भूमि पर इन रियासतों का कब्जा था और करीब 9 करोड़ जनता इन रियासतों में रहती थी।

न रियासतों के शासक भारतीय जरूर थे लेकिन इन पर पूरी तरह से ब्रिटिश शासन का नियंत्रण था। बदले में इन्हें ब्रिटिश पैरामाउंटसी के तहत अनेक प्रकार की स्वायत्ता प्राप्त थी। यही वजह थी कि रियासतों के शासकों को अपनी प्रजा की कोई परवाह नहीं थी और इन रियासतों में रहने वाली प्रजा की स्थिति काफी दयनीय थी।

जब 20 फरवरी 1947 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने भारत की स्वतंत्रता का एलान करते हुए कहा कि “सम्राट की सरकार पैरामाउंटसी के तहत अपनी शक्तियों और कर्तव्यों को ब्रिटिश भारत के किसी भी सरकार को सौंपने का इरादा नहीं रखती है”। तब अंग्रेजों की इसी कूटनीति का फायदा उठाते हुए इन रियासतों ने खुद को भारत में विलय नहीं करने की बात कह कर स्वतंत्र रहने की बात कही। इनमें हैदराबाद रियासत तो अंतिम समय तक इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ, जब तक कि भारत ने सेना भेजकर उसका विलय नहीं कर लिया। हैदराबाद रियासत के इस नापाक इरादे को मोहम्मद जिन्ना ने भी उसे स्वतंत्र रहने की बात कर काफी उकसाया था।

हैदराबाद के निजाम ने विलय प्रस्ताव को कर दिया नामंजूर

हालांकि, 15 अगस्त 1947 तक इन रियासतों में से तीन को छोड़कर बाकी ने भारत में विलय का फैसला किया। लेकिन जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद रियासतों ने भारत में शामिल न होकर स्वतंत्र मुल्क के रूप में रहने की बात कही। इनमें जम्मू-कश्मीर का 26 अक्टूबर 1947 और जूनागढ़ का 20 फरवरी 1948 को भारत में विलय हो गया। लेकिन हैदराबाद रियासत के निजाम ने किसी भी कीमत पर भारत में विलय के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए खुद को स्वतंत्र रहने का एलान कर दिया। आजाद भारत के लिए न तो भौगोलिक रूप से और न ही सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से यह संभव था कि हैदराबाद देश के बीचो-बीच एक नासूर की तरह बना रहे।

हैदराबाद भारत का पहला देशी राज्य था जिसने 1802 में अंग्रेजों के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर किया। इससे खुश होकर अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को ‘हिज एग्जॉल्टेड हाईनेस’ की उपाधि प्रदान की थी, जबकि अन्य रियासत के शासकों को ‘हिज हाईनेस’ की उपाधि दी थी। इसी तरह हैदराबाद निजाम के बेटे को प्रिंस ऑफ वेल्स की तरह ‘प्रिंस ऑफ बरार’ की उपाधि दी थी। 

बसे बड़े रियासतों में से एक थी हैदराबाद की रियासत

हैदराबाद रियासत आजादी के समय भारत के सबसे बड़े रियासतों में से एक थी। जो 82 हजार वर्ग मील से भी ज्यादा क्षेत्र में फैली हुई थी और उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था। जनसंख्या करीब एक करोड़ सत्तर लाख थी।

हैदराबाद रियासत में आज का मराठवाड़ा, कर्नाटक के कई इलाके और पूरा तेलंगाना शामिल था। इनमें 28 फीसदी मराठी, 22 फीसदी कन्नड़ और 50 फीसदी लोग तेलुगू भाषी थे। इनमें करीब 21 लाख उर्दू बोलने वाले भी शामिल थे। राज्य की कुल आबादी में करीब 85 फीसदी हिंदू, 12 फीसदी मुसलमान और बाकी ईसाई, जैन और अन्य धर्म के लोग थे।

चारों तरफ से जमीन से घिरी यह रियासत आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पादन के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा राजघराना था। जो खाद्य, कॉटन, तिलहन, कोयला और सीमेंट उत्पादन में आत्मनिर्भर था। हालांकि पेट्रोल और नमक उसे ब्रिटिश भारत से मंगाना पड़ता था। गुलामी के दिनों में भी हैदराबाद रियासत की अपनी सेना, एयरलाइन, दूरसंचार प्रणाली, रेलवे नेटवर्क, डाक प्रणाली, मुद्रा और रेडियो प्रसारण सेवा थी।

निजाम का शहर और मोतियों का शहर के नाम से मशहूर हैदराबाद की स्थापना 1591 में कुतुबशाही वंश के पांचवे शासक मुहम्मद कुली कुतुबशाह ने मूसी नदी के किनारे किया था। लेकिन हैदराबाद में निजामशाही की शुरुआत 1724 में तब हुई जब दक्कन का मुगल सूबेदार कमर-उद्दीन सिद्दीकी ने मुगल सल्तनत से विद्रोह कर खुद को आजाद घोषित कर दिया और ‘आसफ जाह’ के खिताब के साथ हैदराबाद पर अधिकार कर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

दरअसल औरंगजेब के निधन के बाद मुगल शासक मुहम्मद शाह ने मीर कमर-उद्दीन सिद्दीकी को 1713 में ‘निज़ाम-उल-मुल्क’ के खिताब के साथ दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया था। लेकिन वह विद्रोह कर 1724 में हैदराबाद का सुल्तान बन बैठा।
बाद में आसफ जाह के उत्तराधिकारियों ने हैदराबाद स्टेट पर राज्य किया और वे निजाम कहलाए। हैदराबाद राज्य के सातवें और आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान थे जो 1911 में हैदराबाद के निजाम बने और 1948 तक सत्ता पर काबिज रहे।

दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति माना जाता था निजाम

आजादी के वक्त हैदराबाद का निजाम मीर उस्मान अली खान दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति माना जाता था। तब निजाम की सालाना आय करीब 25 मिलियन डॉलर थी। जो उनके खुद के खर्च के लिए थी। यह राशि निजाम की खुद की रियासत सर्फ-ए-खास, जो पूरे राज्य के क्षेत्रफल का दस फीसदी था, वहां से आती थी। इसके अलावा हर साल उसे राज्य के खजाने से 5 लाख रुपये अलग से मिलता था। इनता अमीर होने के बावजूद निजाम मीर उस्मान अली खान दुनिया का सबसे कंजूस व्यक्ति के रूप में भी मशहूर था, जो नया कपड़ा शायद ही कभी पहनता था। आमतौर पर वह बिना प्रेस किए हुए पैजामा, शर्ट और मलिन फीकी तुर्की टोपी पहनता था। वह शायद ही कभी किसी को शाही भोजन पर दावत देता था।

निजाम उस्मान अली स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासन के लिए भी बदनाम था। निजाम मीर उस्मान अली ने बहुसंख्यक जनता और राज्य की सांस्कृतिक मेल-मिलाप को अनदेखा कर उर्दू को जबरिया दरबार की भाषा बना दिया था। उस्मानिया विश्वविद्यालय की स्थापना भी इसी मकसद से की गई थी। दरअसल निजाम की मंशा आजादी के बाद भी दक्षिण भारत में अपनी सल्तनत कायम रखने की थी।

ऐसे में जब 3 जून 1947 को वायसराय माउंटबेटन ने घोषणा की कि अंग्रेज जल्द ही भारत को छोड़ देंगे। तो निजाम ने भी 12 जून को घोषणा कर दी कि अंग्रेजी हुकूमत खत्म होने के बाद हैदराबाद रियासत पूरी तरह स्वाधीन हो जाएगी और वह पूरी तरह स्वाधीन शासक बन जाएंगे। यहां तक कि निजाम ने अपनी स्वतंत्र रियासत बनाए रखने की बात कहते हुए संविधान सभा तक में अपने प्रतिनिधि भेजने से इनकार कर दिया।

27 जून 1947 को सरदार पटेल ने जब नवगठित रियासत विभाग का अतिरिक्त कार्यभार संभाला और वी पी मेनन सचिव बने, तभी पटेल ने यह साफ कर दिया कि भारत को यह बर्दाश्त नहीं होगा कि ‘उसके क्षेत्र का कोई ऐसा इलाका रह जाए जो उस संघ को नष्ट कर दे जिसे सब ने मिलकर अपने खून पसीने ने बनाया है’। उन्होंने हैदराबाद का भारत में विलय करने के लिए निजाम से बातचीत शुरू कर दिया, लेकिन निजाम हैदराबाद रियासत की आजादी से कम किसी बात पर तैयार नहीं हुए।

हैदराबाद को विलय से बचाने और अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए निजाम ने दीदार, सिद्दिक संगठन, खाकसार पार्टी, निजाम सेना (होम गार्ड) भी बनाई थी। 1926 में ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन’ नामक संगठन बनने के बाद भारत से अलग होने की कोशिश काफी तेज हो गई । वहीं 1940 में निजाम के शासन को बनाए रखने के मकसद से रजाकार नामक एक निजी सेना का गठन किया गया। यह सेना कासिम रिजवी ने बनाई थी, जिसका उद्देश्य हर कीमत पर हैदराबाद को भारत में विलय का विरोध करना था। रजाकारों ने बहुसंख्यक हिंदुओं पर जमकर अत्याचार किए। लोग डरकर हैदराबाद और आस-पास के इलाकों को छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि कभी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल कहा जाने वाला हैदराबाद राज्य पूरी तरह से साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ गया।

1947 में जब देश आजाद हुआ तब महत्वकांक्षी निजाम ने भारत में शामिल नहीं होने की बात कहते हुए एक तीसरे अधिराज्य की पेशकश की और ब्रिटिश कॉमनवेल्थ का सदस्य बनने की बात कही। हालांकि उसके इस प्रस्ताव को न तो भारत और न ही ब्रिटेन ने तवज्जो दिया।

15 अगस्त 1947 के बाद भी जब हैदराबाद का भारत में विलय पर कोई बात नहीं बन पाई तब तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन के कहने पर भारत सरकार और निजाम के बीच नवंबर 1947 में एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट हुआ। इसमें तय किया गया कि 15 अगस्त 1947 के पहले तक हैदराबाद से जो पारस्परिक संबंध की व्यवस्था थी वह बनी रहेगी। इस समझौते के तहत निजाम को हैदराबाद में एक प्रतिनिधि सरकार का गठन करना था। भारत सरकार और हैदराबाद रियासत को एक दूसरे के यहां अपने-अपने एजेंट नियुक्त करने थे। भारत की तरफ से हैदराबाद में के एम मुंशी एजेंट नियुक्त हुए। वहीं निजाम ने नवंबर में लायक अली को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

लेकिन निजाम उस्मान अली खान ने जल्द ही इस संधि का उल्लंघन करना शुरू कर दिया और बिना भारत को बताए पाकिस्तान को करोड़ों रुपये का ऋण दे दिया। निजाम ने बिना भारत को सूचित किए पाकिस्तान में अपना एक जन सम्पर्क अधिकारी भी नियुक्त कर दिया। उसने ब्रिटेन के मशहूर वकील सर वाल्टर मोंकटोन को भारत सरकार के साथ संधि करने के लिए अपना संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया। साथ ही विदेशों से हथियार खरीदने की कोशिश भी करने लगे।

इस बीच हैदराबाद की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी। पाकिस्तान से चोरी-छिपे हथियार मंगाए जा रहे थे। रजाकारों के जरिए सीमाओं पर गड़बड़ी पैदा की जा रही थी और रेलगाड़ियों को लूटा जा रहा था। निजाम को इन हरकतों से कांग्रेस और वामपंथी आंदोलनों के विरोध का सामना भी करना पड़ा था जो रियासत में एक जिम्मेदार सरकार की मांग कर रहे थे और सामंतवादी शोषण पर रोक लगाने की आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन निजाम की सरकार ने इस पर ध्यान नहीं देते हुए उल्टे हजारों लोगों को जेल में डाल दिया और कांग्रेस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया।

हालात तब बेकाबू हो गए जब 22 मई 1948 को रजाकारों ने हैदराबाद के पास गंगापुर स्टेशन पर एक ट्रेन पर हमला कर दिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने 26 जुलाई 1948 को हैदराबाद की स्थिति पर एक ‘श्वेत पत्र’ जारी किया।

सरदार पटेल ने संविधान सभा में कहा कि हैदराबाद को भारत में मिलाने के लिए कार्रवाई करनी जरूरी हो गई है। हालांकि तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल फ्रांसिस रॉबर्ट बूचर ने हैदराबाद पर किसी भी तरह के आक्रमण का विरोध किया था। उन्हें डर था कि इसके बदले में पाकिस्तान अहमदाबाद और बॉम्बे पर हवाई हमला कर सकता है। लेकिन सरदार पटेल अपने निर्णय पर अडिग रहे कि राज्य में शांति व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के लिए पुलिस कार्रवाई की जाए।

राजनीतिक अनिश्चितता की वजह से पटेल को दो बार हैदराबाद पर कार्रवाई टालनी पड़ी थी। लेकिन तीसरी बार वह बिलकुल दृढ़ थे और उन्होंने इसकी घोषणा तभी की जब 13 सितंबर 1948 की सुबह 4 बजे भारतीय सेना मेजर जनरल जे एन चौधरी के नेतृत्व में हैदराबाद अभियान शुरू कर चुकी थी। महज पांच दिन के अंदर 17 सितंबर 1948 की शाम 5 बजे निजाम उस्मान अली ने रेडियो पर संघर्ष विराम और रजाकारों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। इसके साथ ही हैदराबाद में भारत का ‘पुलिस एक्शन’ समाप्त हो गया।

18 सितंबर की शाम 4 बजे हैदराबाद रियासत के सेना प्रमुख मेजर जनरल एल ईद्रूस ने अपने सैनिकों के साथ भारतीय मेजर जनरल जे एन चौधरी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम दिया गया था, क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा पोलो के 17 मैदान थे।

इन सब के बीच निजाम उस्मान अली ने हैदराबाद को भारत में विलय से बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। 10 सितंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की। साथ ही सुरक्षा परिषद में मामले को उठाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भी भेजा। जब तक सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर कोई निर्णय होता, तब तक भारतीय सेना हैदराबाद का विलय कर चुकी थी और निजाम का शासन समाप्त हो चुका था।

हैदराबाद रियासत का भारत संघ में विलय

17 सितंबर को आत्मसमर्पण के बाद हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री लायक अली और रजाकार मिलिशिया के प्रमुख कासीम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया। 23 सितंबर को निजाम ने सुरक्षा परिषद में दिए गए अपने कंप्लेन वापस ले लिया और हैदराबाद रियासत की भारत संघ में विलय की घोषणा की। मेजर जनरल जे एन चौधरी को हैदराबाद का सैन्य गवर्नर नियुक्त किया गया। 1949 तक वे इस पद पर बने रहे। 24 नवंबर 1949 को निजाम ने घोषणा की कि भारत का संविधान ही हैदराबाद का संविधान होगा और 26 जनवरी 1950 को हैदराबाद राज्य नियमित तौर पर भारत का हिस्सा बन गया। यह वह दिन था जब भारत का संविधान लागू किया गया था। जनवरी 1950 में एम के वेलोडी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया और निजाम को राज्य प्रमुख।

निजाम के प्रति भारत सरकार ने उदारता दिखाते हुए उन्हें कोई सजा नहीं दी और 50 लाख रुपए की प्रिवी पर्स के साथ ही उन्हें अपनी विशाल संपत्ति का ज्यादातर भाग अपने पास रखने की अनुमति दे दी।

1952 में राज्य में पहला विधानसभा चुनाव हुआ और बी रामकृष्ण राव पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। 1956 में भाषायी आधार पर हैदराबाद स्टेट के तेलंगाना क्षेत्र को तेलुगू भाषी राज्य आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया। जबकि मराठी भाषी हिस्से को महाराष्ट्र में और कन्नड वाले इलाके को कर्नाटक में मिला दिया गया। हैदराबाद नए बने राज्य आंध्र प्रदेश की राजधानी बना। हैदराबाद रियासत की भारत में विलय के साथ ही भारतीय संघ के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी हो गई और इस एकीकरण के शिल्पकार थे देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए यूपी जागरण डॉट कॉम उत्तरदायी नहीं है।

(लेखक धार्मिक मामलो की जानकार एवं रष्ट्रीय विचारक है )

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