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प्रणब दा:एक युग का अंत

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अनुभवों का अनंत भंडार रखनेवाले प्रणव दा पर कभी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा
प्रणब दा: कई बार प्रधानमंत्री पद के लिए चला था उनका नाम, लेकिन बने तो राष्ट्रपति

प्रणब दा: इंदिरा युग की आखिरी कड़ी थे !मन से कांग्रेसी बने रहे लेकिन ओने को कभी किसी खोल में बंद नहीं किया !इतिहास उनका मूल्यांकन हमेशा एक ऐसे राजनेता के रूप में करेगा ,जिसका जीवन समरसता और भारतीयता से ओतप्रोत था प्रणव मुखर्जी भद्र बंगाली मानुष थे, इसीलिए संस्कृतिवान भी थे। प्रणव दा चाहे जितने बड़े पद पर रहे, यहां तक कि राष्ट्रपति बन जाने पर भी वे दुर्गापूजा में अपने गांव मिराती आना कभी नहीं भूलते थे। तीन दिनों तक पारंपरिक भद्र बंगाली पोशाक में दुर्गापूजा करते थे। चंडीपाठ करते थे। राष्ट्रपति पद से अवकाश लेने के बाद प्रणव दा का अधिकतर समय लिखने-पढ़ने पर खर्च होता था। 

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प्रणव दा संसद में दिए भाषणों के संकलन से लेकर राष्ट्रपति के रूप में अपने भाषणों के संकलन की तैयारी में स्वयं रुचि ले रहे थे। प्रणव दा की किताब ‘कांग्रेस एंड मेकिंग आफ इंडियन नेशन’ (दो खंड) में कांग्रेस के 125 वर्षों के इतिहास व उसकी बाहरी व भीतरी चुनौतियों का आख्यान है। उनकी इधर के वर्षों में आई किताबों-‘द ड्रैमेटिक डिकेड: द इंदिरा गांधी ईयर्स’, ‘द टर्बुलेंट ईयर्स’, ‘द कोएलिशन इयर्स’, ‘थाट्स एंड रेफ्लेक्शन’ का जिस तरह स्वागत हुआ, उससे वे उत्साहित थे। 
द ड्रैमेटिक डिकेड : द इंदिरा गांधी ईयर्स’ में इमरजेंसी, बांग्लादेश मुक्ति, जेपी आंदोलन, 1977 के चुनाव में हार, कांग्रेस में विभाजन, 1980 में सत्ता में वापसी और उसके बाद के विभिन्न घटनाक्रमों पर अलग-अलग अध्याय हैं। ‘द टर्बुलेंट ईयर्स’ में 1980 से 1996 के राजनीतिक इतिहास को उन्होंने कलमबद्ध किया था और ‘द कोएलिशन इयर्स’ में 1996 से 16 वर्षों तक के राजनीतिक घटनाक्रम को उन्होंने शब्द दिए थे। 
‘थाट्स एंड रेफ्लेक्शन’ किताब में विभिन्न विषयों पर प्रणव दा के विचार संकलित थे। प्रणव दा अपने पूरे सार्वजनिक जीवन के अनुभव इस तरह लिख रहे थे, जो राजनीतिक पुनर्पाठ में सहायक हों। प्रणव दा इससे तृप्त थे कि संवैधानिक पदों पर रहते हुए लोकतंत्र तथा संविधान की नींव मजबूत करने के लिए स्थापित परंपराओं और मानकों पर एकदम खरा उतरे। 

राष्ट्रपति बनने के पहले भी जो भी जिम्मेदारी प्रणव दा को दी गई, उसका पूरे दायित्व के साथ उन्होंने पालन किया था। केंद्र में वित्त, वाणिज्य, विदेश और योजना जैसे महत्वपूर्ण विभागों का मंत्रालय उन्होंने बेहद सफलतापूर्वक संभाला था। तीन-तीन बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें नंबर दो की हैसियत हासिल हुई थी। 

इंदिरा गांधी जब 1980 में दोबारा सत्ता में आईं तो अपनी विदेश यात्राओं के समय सरकार का काम-काज देखने के लिए वे प्रणव मुखर्जी को ही अधिकृत कर जाती थीं। उसके 24 साल बाद 2004 में मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में उन्हें फिर नंबर दो की हैसियत मिली थी। फिर 2009 में यूपीए की सरकार फिर बनने पर प्रणव दा का नंबर दो का दर्जा बरकरार रहा था। 

प्रणव मुखर्जी ने इंदिरा गांधी, पीवी नरसिंह राव, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी के नेतृत्व में कई कठिन परिस्थितियों में अपनी बुद्धिमत्ता तथा राजनीतिक कौशल से कांग्रेस पार्टी को संकट से उबारा था। उन्होंने दशकों तक कांग्रेस के लिए थिंक टैंक के रूप में काम किया। आर्थिक और वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ माने जानेवाले प्रणव दा को न्यूयार्क की पत्रिका यूरो मनी ने 1984 में विश्व के सर्वश्रेष्ठ पांच वित्त मंत्रियों में एक माना था। 

उनके राजनीतिक चातुर्य का लोहा विरोधी भी मानते रहे हैं। इसलिए क्योंकि प्रणव दा ने अपनी राजनीति को मूल्यवान बनाए रखा था। उनके लिए राजनीति का अर्थ चुनावों में जीत, सत्ता और तंत्र की राजनीति नहीं थी। उनकी राजनीति का संबंध मूल्यों से था। वे उन चुनिंदा नेताओं में थे जो राजनीति के मूल्यों के प्रति सदा-सर्वदा सचेत रहते हैं और नाना धर्मों में आस्था रखनेवाले और दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता रखनेवाले धर्मनिरपेक्ष लोगों के साथ सदैव तनकर खड़े रहते हैं।

उनकी राजनीति इसलिए भी मूल्यवान बन सकी थी क्योंकि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए कभी सिद्धांतविहीन समझौते नहीं किए। 1987 में प्रणव दा ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई थी। दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल तक कांग्रेस में प्रणव दा का न कोई कट्टर समर्थक था न कोई गुट इसीलिए प्रणव दा की पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस को बंगाल में अपेक्षित समर्थक नहीं मिले और अंततः दो साल बाद उन्हें अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय करना पड़ा। 

कांग्रेस ने भी उन्हें फिर महत्वपूर्ण दायित्व दिया था। अनुभवों का अनंत भंडार रखनेवाले प्रणव दा पर कभी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा। किसी घोटाले में भी उनका नाम कभी नहीं आया। हरित क्रांति लानेवाले सी. सुब्रमण्यम के सान्निध्य और साहचर्य में सरकारी कामकाज सीखनेवाले प्रणव दा बहुत मेहनती थे। सुबह से लेकर देर रात तक खटते करते थे। कोई काम कल पर नहीं छोड़ते थे। कदाचित इन्हीं गुणों के कारण वे राजनीति में चार दशकों से भी लंबी सफल पारी खेल सके थे।

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